Bihar Fisheries : मत्स्य संसाधनों के सटीक आकलन की दिशा में बिहार सरकार ने तकनीक आधारित बड़ा कदम उठाया है. डेयरी, मत्स्य व पशु संसाधन विभाग ने राज्य के सभी जल निकायों का वैज्ञानिक सर्वे कराने और मछली उत्पादन का प्रमाणिक डाटा तैयार करने के लिए 14.44 करोड़ रुपये की योजना को प्रशासनिक मंजूरी दे दी है.
अब तक उत्पादन के आंकड़े स्थानीय बाजारों, आयात-निर्यात प्रवृत्तियों और क्षेत्रीय स्तर पर प्राप्त अनुमानों पर आधारित रहे हैं. इन्हें पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं माना जाता. ऐसे में आधुनिक तकनीक के जरिए वास्तविक स्थिति सामने लाने की पहल की गई है.
10.8 लाख हेक्टेयर जलस्रोतों का होगा तकनीकी मैपिंग
राज्य में करीब 10.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में नदी, तालाब, नहर, चौर और अन्य जलस्रोत फैले हैं. लेकिन इनकी वर्तमान स्थिति, वास्तविक क्षेत्रफल और उत्पादन क्षमता का अद्यतन डाटा उपलब्ध नहीं है.
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नई योजना के तहत सैटेलाइट इमेजिंग के माध्यम से सभी जल निकायों का सर्वे किया जाएगा. जहां स्थल कठिन या क्षेत्र विशाल होगा, वहां ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाएगा. प्रत्येक जलस्रोत की तस्वीरें और कम से कम पांच सेकंड का वीडियो क्लाउड प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि भविष्य में तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके.
तीन कृषि-जलवायु क्षेत्रों में चरणबद्ध सर्वे
परियोजना को राज्य के तीन एग्रो-क्लाइमेट जोन के आधार पर चरणों में लागू किया जाएगा. पहले चरण में मुंगेर प्रमंडल, दूसरे चरण में पूर्णिया और कोसी प्रमंडल, जबकि तीसरे चरण में भागलपुर प्रमंडल को शामिल किया गया है.
मछली उत्पादन के आंकड़ों के विश्लेषण के लिए केंद्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित विशेष सॉफ्टवेयर का उपयोग होगा, जिससे आंकड़ों की वैज्ञानिक पुष्टि हो सके.
कमांड सेंटर से होगी निगरानी
योजना के क्रियान्वयन के लिए कोडबकेट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को सेवा प्रदाता एजेंसी चुना गया है. एजेंसी एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर स्थापित करेगी, जहां से डाटा की मॉनिटरिंग और विश्लेषण किया जाएगा.
इसके लिए प्रोजेक्ट मैनेजर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर और मत्स्य विशेषज्ञों की टीम तैनात की जाएगी, जो फील्ड सर्वे से लेकर डाटा प्रोसेसिंग तक की जिम्मेदारी संभालेगी.
मत्स्य पालकों को क्या होगा लाभ?
सटीक और अद्यतन डाटा उपलब्ध होने से सरकार लक्षित योजनाएं तैयार कर सकेगी. इससे मत्स्य पालन की उत्पादकता बढ़ाने, जलस्रोतों के वैज्ञानिक प्रबंधन और निवेश की प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक होगी, बल्कि जल संसाधनों के दीर्घकालिक संरक्षण और विकास की दिशा में भी अहम भूमिका निभाएगी.
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