SIM Binding Rule: मोबाइल मैसेजिंग ऐप्स को लेकर सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. WhatsApp, Telegram और Signal जैसे प्लेटफॉर्म पर लागू होने वाले ‘सिम-बाइंडिंग’ नियम को फिलहाल टाल दिया गया है. पहले यह व्यवस्था 26 फरवरी से लागू की जानी थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों और उद्योग जगत की मांग को देखते हुए इसकी समयसीमा बढ़ाकर अब 31 दिसंबर 2026 कर दी गई है. इस फैसले के बाद संबंधित कंपनियों को अपनी तकनीकी तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है. साथ ही यह विषय फिर से चर्चा में आ गया है कि आने वाले समय में मैसेजिंग ऐप्स के इस्तेमाल का तरीका किस तरह बदल सकता है.
सिम-बाइंडिंग नियम क्या है और इससे क्या बदलाव होगा
इस नियम के तहत मैसेजिंग ऐप्स केवल उसी मोबाइल डिवाइस पर काम करेंगे, जिसमें संबंधित सक्रिय सिम कार्ड मौजूद होगा. यानी यूजर का अकाउंट सीधे उसी मोबाइल नंबर से जुड़ा रहेगा, जो KYC के जरिए प्रमाणित है. इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी अकाउंट की पहचान अधिक स्पष्ट और ट्रैसेबल रहे. माना जा रहा है कि इससे फर्जी प्रोफाइल, संदिग्ध इस्तेमाल और पहचान छिपाकर किए जाने वाले दुरुपयोग पर नियंत्रण मजबूत हो सकता है.
वेब वर्जन को लेकर पुराने निर्देशों में भी बदलाव
शुरुआती निर्देशों में यह कहा गया था कि ऐप्स के वेब वर्जन को छह घंटे के बाद ऑटोमैटिक लॉग-आउट करना होगा. अब इस व्यवस्था में बदलाव किया गया है. इसकी जगह AI आधारित जोखिम विश्लेषण प्रणाली लागू करने की बात कही गई है. इसका मतलब यह है कि लॉग-आउट का फैसला तय समय सीमा के आधार पर नहीं, बल्कि यूजर की गतिविधियों और सुरक्षा जोखिमों को देखकर किया जाएगा. यानी वेब इस्तेमाल के नियम अब पहले की तुलना में अलग तरीके से लागू हो सकते हैं.
सरकार इसे क्यों जरूरी मान रही है
इस कदम के पीछे डिजिटल धोखाधड़ी से जुड़े मामलों को एक बड़ी वजह माना जा रहा है. हाल के समय में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल फर्जी पहचान, सरकारी अधिकारी बनकर कॉल करने, फिशिंग, निवेश धोखाधड़ी और तथाकथित ‘रिमोट डिजिटल अरेस्ट’ जैसे स्कैम के लिए किया गया. ऐसे मामलों में अकाउंट और मोबाइल पहचान को जोड़कर रखने से जांच और ट्रैकिंग आसान होने की उम्मीद जताई जा रही है. यही वजह है कि इस नियम को सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
नियम को लेकर उद्योग जगत ने क्या आपत्ति जताई
इस प्रस्तावित नियम को लेकर उद्योग जगत की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं. ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम (BIF) ने इसकी कानूनी वैधता पर आपत्ति जताई है. फोरम का कहना है कि यह नियम टेलीकॉम अधिनियम के दायरे से बाहर हो सकता है और इसे असंवैधानिक भी माना जा सकता है. इस फोरम में Meta और Google जैसी कंपनियां भी शामिल हैं. इन कंपनियों की ओर से सरकार से इस नियम पर दोबारा विचार करने की मांग की गई है. ऐसे में अब यह मामला तकनीकी, कानूनी और सुरक्षा तीनों स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है.
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