Jharkhand News: लातेहार में जब्त वाहन की नीलामी से जुड़ा भुगतान विवाद अब झारखंड हाईकोर्ट तक पहुंच गया है. अदालत ने इस मामले में जिला खनन पदाधिकारी को याचिकाकर्ता के पक्ष में 28 लाख रुपये का भुगतान तुरंत सुनिश्चित करने को कहा है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि रकम लौटाने की प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक देरी भर नहीं लगती, बल्कि पूरे घटनाक्रम में ऐसी चूक हुई है जिससे सही पक्ष को समय पर पैसा नहीं मिल सका. इसी बिंदु पर अदालत ने कड़ा रुख दिखाया और जिम्मेदार अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए.
भुगतान प्रक्रिया में अलग-अलग तरीके अपनाने पर कोर्ट ने जताई आपत्ति
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने इस बात को गंभीर माना कि ब्याज की राशि एक तरीके से दी गई, जबकि मूल रकम के भुगतान में अलग रास्ता अपनाया गया. याचिकाकर्ता ‘जेके मिनरल एंड डेवलपर्स’ की ओर से कोर्ट को बताया गया कि 28 लाख रुपये ट्रांसफर करते समय कंपनी के नाम की जगह प्रोपराइटर का नाम दर्ज कर दिया गया था. इसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण रकम सही खाते तक नहीं पहुंच सकी. अदालत ने इस पहलू को हल्के में नहीं लिया और संकेत दिया कि भुगतान की प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से उलझाया गया. कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसी त्रुटि से याचिकाकर्ता को सीधे नुकसान हुआ.
नीलामी के बाद सामने आई लोन और NOC की बाधा
पूरा विवाद उस वाहन से जुड़ा है जिसे प्रशासन ने अवैध ढुलाई के आरोप में जब्त करने के बाद नीलामी में बेच दिया था. याचिकाकर्ता जाफर अली ने इस वाहन को खरीद लिया, लेकिन बाद में रजिस्ट्रेशन के समय पता चला कि वाहन पर पहले से लोन बकाया है. ऐसे में NOC के बिना उसका पंजीकरण संभव नहीं था. इसी वजह से खरीदार को न तो वाहन का पूरा उपयोग मिल सका और न ही मामला आसानी से सुलझ पाया. यह विवाद बढ़ते-बढ़ते अदालत तक पहुंचा, जहां पहले भी यह निर्देश दिया गया था कि समस्या का समाधान नहीं होने पर वाहन वापस लेकर नीलामी की रकम लौटाई जाए.
अगली तारीख से पहले रकम नहीं लौटी तो अधिकारी को खुद होना पड़ेगा हाजिर
अदालत ने अब इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 6 अप्रैल की तारीख तय की है. साथ ही साफ कर दिया है कि यदि तय समय तक भुगतान की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने उपस्थित होना पड़ेगा. इस निर्देश के बाद मामला सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह प्रशासनिक जवाबदेही का भी मुद्दा बन गया है. हाईकोर्ट के इस सख्त रुख से साफ है कि अब इस मामले में और ढील मिलने की संभावना नहीं है.
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