Saudi Arabia Oil facility Attacked: पश्चिम एशिया में जारी सैन्य टकराव अब ऊर्जा अवसंरचना तक पहुंच गया है. सोमवार को सऊदी अरब की प्रमुख तेल निर्यात सुविधा रास तनुरा रिफाइनरी के एक हिस्से में ड्रोन हमले के बाद आग लगने की घटना सामने आई. यह संयंत्र सरकारी तेल कंपनी Saudi Aramco के नियंत्रण में है और वैश्विक कच्चे तेल आपूर्ति नेटवर्क की केंद्रीय कड़ी माना जाता है.
प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार आग सीमित दायरे में भड़की और दमकल इकाइयों ने तेजी से उसे नियंत्रित कर लिया. बड़े पैमाने पर नुकसान या जनहानि की पुष्टि नहीं हुई है, हालांकि एहतियातन कुछ संचालन अस्थायी रूप से रोक दिए गए. हमले की जिम्मेदारी को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्रीय घटनाक्रम को देखते हुए संदेह ईरान की ओर जताया जा रहा है. सऊदी अरब ने फिलहाल सार्वजनिक रूप से किसी जवाबी कार्रवाई का ऐलान नहीं किया है.
Iran has started attacking Saudi Arabia's oil infrastructure, targeting the ARAMCO refinery at Ras Tannoura pic.twitter.com/6khNNyeyRl
— Navroop Singh (@TheNavroopSingh) March 2, 2026
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रास तनुरा रिफाइनरी की प्रसंस्करण क्षमता लगभग 5.5 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है. यदि यहां उत्पादन या शिपमेंट में लंबी रुकावट आती है तो पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन जैसे उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में उछाल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला सिर्फ एक औद्योगिक इकाई पर नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन की स्थिरता पर सीधा दबाव है.
ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, होर्मुज पर बढ़ी निगरानी
हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में सतर्कता बढ़ गई है. पश्चिम एशिया पहले से अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य अभियानों की वजह से तनावग्रस्त है. विशेष रूप से Strait of Hormuz पर वैश्विक नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की समुद्री आवाजाही होती है. यदि रिफाइनरियों, निर्यात टर्मिनलों या शिपिंग मार्गों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं बढ़ती हैं, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
इसी बीच ईरान के सरकारी प्रसारक Press TV ने बहरीन के सलमान पोर्ट पर ईरानी मिसाइल हमले की रिपोर्ट प्रसारित की. ईरानी मीडिया का दावा है कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल अमेरिकी सैन्य रसद और उपकरणों की ढुलाई के लिए किया जा रहा था, जिन्हें ईरान के खिलाफ कार्रवाई में लगाया जाना था. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हुई है.
ऑपरेशन की पृष्ठभूमि और जवाबी लहर
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ‘Operation Epic Fury’ और ‘Operation Roaring Lion’ नामक संयुक्त अभियान के तहत ईरान में व्यापक हवाई व मिसाइल हमले किए थे. इन कार्रवाइयों में सैन्य अड्डों, मिसाइल बैटरियों, परमाणु-संबंधी ढांचे और शीर्ष नेतृत्व से जुड़े परिसरों को लक्ष्य बनाया गया.
इसके जवाब में ईरान ने ‘Operation True Promise 4’ की घोषणा की और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों, सहयोगी देशों की सैन्य सुविधाओं और रणनीतिक परिसरों पर हमले तेज कर दिए. सऊदी अरब पर ड्रोन हमले से पहले संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख शहर दुबई और अबूधाबी के आसपास भी संदिग्ध गतिविधियों और अलर्ट की खबरें सामने आई थीं.
IRGC का बयान-कार्रवाई जारी रहने के संकेत
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अपने ताजा बयान में कहा कि नई लहर में ‘खैबर’ मिसाइलों की रणनीतिक तैनाती की गई है और आगे भी कार्रवाई जारी रहेगी. बयान में यह भी कहा गया कि विरोधी पक्ष के ठिकानों पर ‘भीषण प्रहार’ किए जाएंगे.
क्षेत्रीय मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर ईरान के ड्रोन बेड़े और कथित हमलों के वीडियो साझा किए गए हैं. वहीं पहले कुवैत में अमेरिकी F-15 Eagle गिराए जाने का दावा भी ईरानी मीडिया में उछाला गया था, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई.
खाड़ी देशों की चिंता और वैश्विक प्रतिक्रिया
इजरायल के i24 न्यूज के संवाददाता अमिचाई स्टीन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि खाड़ी देशों के वरिष्ठ अधिकारी जवाबी हमलों की तीव्रता से हैरान हैं. उनके अनुसार, कई अधिकारियों को आशंका है कि संघर्ष अब केवल सैन्य लक्ष्यों तक सीमित नहीं रह सकता. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कथित तौर पर कहा कि हालात उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से बिगड़ रहे हैं.
दुनिया भर के नेता और अंतरराष्ट्रीय संगठन क्षेत्र में तनाव कम करने की अपील कर रहे हैं. व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की आशंका से वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर गहरा असर पड़ सकता है. फिलहाल हालात अनिश्चित बने हुए हैं और संघर्ष थमता नजर नहीं आ रहा.
रास तनुरा पर हमला इस बात का संकेत है कि टकराव अब रणनीतिक ऊर्जा अवसंरचना तक पहुंच चुका है. यदि यह क्रम जारी रहा तो इसके प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ईंधन बाजारों पर भी व्यापक असर पड़ सकता है.
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