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डीएनए जांच में देरी पर हाईकोर्ट नाराज, बोकारो लापता युवती केस में डीजीपी से जवाब तलब

Jharkhand High Court: बोकारो लापता युवती मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने डीएनए जांच में देरी, SIT जांच और कंकाल की पहचान पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने सभी वरिष्ठ अधिकारियों को तलब कर जांच तेज करने के निर्देश दिए हैं.

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो की 18 वर्षीय लापता युवती से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी जताई है. जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में जांच की गति बेहद धीमी है और वैज्ञानिक साक्ष्यों को लेकर गंभीर लापरवाही दिखाई दे रही है. कोर्ट ने विशेष रूप से बरामद किए गए कंकाल की पहचान को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि बिना डीएनए जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है.

डीएनए टेस्ट और फॉरेंसिक जांच में देरी पर कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के डीजीपी से सीधा सवाल किया कि अब तक बरामद कंकाल का डीएनए टेस्ट क्यों नहीं कराया गया. कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या युवती के माता पिता के सैंपल लेकर फॉरेंसिक साइंस लैब भेजे गए हैं या नहीं. खंडपीठ ने टिप्पणी की कि कंकाल मिलने के तीन से चार दिन बीत जाने के बावजूद जांच में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई दे रही है, जो गंभीर चिंता का विषय है. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या जांच एजेंसियां केवल कोर्ट के आदेश का इंतजार कर रही हैं.

सरकार का पक्ष, लेकिन कोर्ट असंतुष्ट

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि बरामद कंकाल का पोस्टमार्टम कराया जाएगा और उसका फॉरेंसिक साइंस लैब व डीएनए परीक्षण भी किया जाएगा. सरकार ने यह भी कहा कि जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है. हालांकि कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने जांच की धीमी गति पर नाराजगी जताई. खंडपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में वैज्ञानिक जांच समय पर होना बेहद जरूरी है ताकि सच्चाई जल्द सामने आ सके.

याचिकाकर्ता का दावा, कंकाल पर उठे सवाल

याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अदालत में कहा गया कि जो कंकाल बरामद हुआ है, वह लापता युवती का नहीं है. इस दावे के समर्थन में पूरक हलफनामा दाखिल किया गया और कंकाल की तस्वीरें भी अदालत में पेश की गईं. इस पर हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि आखिर किस आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि यह कंकाल उसी युवती का है. अदालत ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच के निर्देश दिए.

SIT जांच पर भी सवाल, CBI जांच की संभावना

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विशेष जांच दल यानी SIT की जांच में किसी तरह की लापरवाही या गड़बड़ी पाई जाती है, तो इस मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपा जा सकता है. अदालत ने कहा कि जांच में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी. यह टिप्पणी मामले की गंभीरता और कोर्ट की सख्ती को दर्शाती है.

16 अप्रैल को सभी वरिष्ठ अधिकारियों को तलब

हाईकोर्ट ने डीजीपी, आईजी बोकारो, डीआईजी बोकारो, एसपी बोकारो, एफएसएल निदेशक और नई SIT टीम को 16 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है. साथ ही पिंड्राजोरा थाना कांड संख्या 147/2025 से जुड़े सभी दस्तावेज, केस डायरी और जांच से संबंधित सामग्री कोर्ट में प्रस्तुत करने को कहा गया है.

मेडिकल रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट को फिलहाल सीलबंद लिफाफे में ही रखा जाएगा और इसे अंतिम आदेश से पहले नहीं खोला जाएगा. इससे पहले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि मेडिकल रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है और उसे सुरक्षित रूप से अदालत में जमा किया गया है. कोर्ट ने इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड में शामिल कर लिया है.

मामला कैसे शुरू हुआ, पूरी पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला बोकारो जिले की 18 वर्षीय युवती के 19 मार्च 2025 से लापता होने से जुड़ा है. इस संबंध में 31 जुलाई 2025 को पिंड्राजोरा थाना में कांड संख्या 147/2025 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी. बाद में 11 दिसंबर 2025 को परिजनों को एक कॉल आया जिसमें बताया गया कि युवती पुणे में है.

पुलिस जांच में बड़ी चूक सामने आई

पुलिस ने कॉल करने वाले युवक को गिरफ्तार किया था, जिसने दावा किया कि युवती उसके दोस्त के पास पुणे में है. लेकिन जांच के दौरान वह पुलिस टीम को चकमा देकर फरार हो गया. इस घटना ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब तक युवती का कोई पता नहीं चल सका है, जिससे परिवार की चिंता लगातार बढ़ रही है.

पूरे राज्य की नजर मामले पर

इस संवेदनशील मामले पर पूरे राज्य की नजर बनी हुई है. हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जांच एजेंसियों पर दबाव बढ़ गया है. उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में जांच में तेजी आएगी और सच सामने आएगा. यदि किसी स्तर पर लापरवाही साबित होती है तो मामला सीबीआई को भी सौंपा जा सकता है, जिससे जांच की पारदर्शिता सुनिश्चित होगी.

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सोनी कुमारी
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