GDP Growth: ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने उम्मीदों से बेहतर प्रदर्शन किया है. अप्रैल–जून की तुलना में विकास दर और तेज हुई और पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही की 5.6% की रफ्तार को भी पीछे छोड़ दिया. जीएसटी दरों में कमी, खर्च में बढ़ोतरी और उत्पादन गतिविधियों में सुधार ने बाजार में तेजी लाई. उद्योगों में मांग बढ़ी और कुल आर्थिक गतिविधियों को एक नई गति मिली. आर्थिक जानकार इसे भारत की ग्रोथ स्टोरी का मजबूत संकेत मान रहे हैं.
तिमाही में विनिर्माण सेक्टर का सबसे दमदार प्रदर्शन
जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस तिमाही में विनिर्माण सेक्टर ने सबसे दमदार प्रदर्शन किया. जहां पिछले वर्ष की समान अवधि में केवल 2.2% की वृद्धि देखी गई थी, वहीं इस बार 9.1% तक बढ़ोतरी दर्ज हुई. उपभोग में सुधार, लागत में राहत और उत्पादन में निरंतर तेजी ने उद्योग जगत को मजबूत आधार दिया. जीडीपी में 14% हिस्सेदारी वाला यह क्षेत्र अब आर्थिक रिकवरी को आगे बढ़ाने वाली मुख्य ताकत बनकर उभरा है.
रियल और नॉमिनल ग्रोथ के बीच कम हुआ अंतर
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी के मुताबिक रियल GDP ग्रोथ 8.2% के साथ उम्मीद से अधिक रही, जबकि नॉमिनल ग्रोथ 8.7% तक पहुंची. दोनों के बीच अंतर पिछले पांच वर्षों में सबसे कम रहा है. कम डिफ्लेटर, महंगाई में नरमी और खासकर खाद्य मुद्रास्फीति में कमी ने उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता बढ़ाई, जिससे प्राइवेट कंजम्पशन को मज़बूती मिली.
‘लो बेस इफेक्ट’ ने भी विकास दर को बेहतर दिखाने में भूमिका निभाई
धर्मकीर्ति जोशी ने कहा कि सप्लाई साइड से देखें तो विनिर्माण और सेवाओं दोनों में साफ सुधार दिखाई देता है. औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार और सेवाओं का विस्तार जीडीपी को मज़बूत सहारा दे रहे हैं. सांख्यिकीय ‘लो बेस इफेक्ट’ ने भी विकास दर को बेहतर दिखाने में भूमिका निभाई, क्योंकि पिछले वर्ष इसी समय विकास गति कमजोर थी.
वित्त वर्ष 2025 की ग्रोथ उम्मीद से बेहतर
उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अब वित्त वर्ष 2025 की GDP वृद्धि का अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 7% कर दिया गया है. पहली छमाही में 8% तक की मजबूती देखने के बाद दूसरी छमाही में कुछ नरमी की संभावना जताई गई है, जिसमें सरकारी पूंजीगत खर्च सामान्य होने और अमेरिकी आयात शुल्कों के प्रभाव जैसी वजहें शामिल हैं.
टैक्स कलेक्शन केवल 4% बढ़ा
धर्मकीर्ति जोशी ने यह भी कहा कि रियल ग्रोथ प्रभावशाली दिख रही है, लेकिन नॉमिनल ग्रोथ की सुस्ती आने वाले समय में चुनौतियां बढ़ा सकती है. अप्रैल से अक्टूबर के बीच टैक्स कलेक्शन केवल 4% बढ़ा है, जबकि वार्षिक लक्ष्य 11% रखा गया था. नॉमिनल ग्रोथ कमजोर रही तो कॉर्पोरेट मुनाफे और क्रेडिट ग्रोथ पर असर पड़ सकता है.
GDP के नए बेस ईयर से आंकड़ों में संभावित बदलाव
सरकार जल्द ही GDP की बेस ईयर सीरीज को 2011–12 की जगह 2022–23 करने जा रही है. इससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को और बेहतर तरीके से दर्शाया जा सकेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि बेस ईयर में बदलाव के बाद मौजूदा अनुमानों में कुछ समायोजन संभव है.
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