JMM Assam Politics: झारखंड तक सीमित रहने वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा अब पूर्वोत्तर भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है.
असम विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी आदिवासी और टी-ट्राइब समुदाय के बीच पैठ बनाने की कोशिशों में जुटी है.
झामुमो ने संकेत दिए हैं कि वह आने वाले समय में क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करना चाहती है. इसी सोच के तहत असम को एक नए राजनीतिक मैदान के रूप में देखा जा रहा है, जहां सामाजिक समीकरण और समुदाय आधारित राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
आदिवासी बेल्ट में संभावनाएं तलाश रही पार्टी
पार्टी सूत्र बताते हैं कि झामुमो की नजर असम की 35 से 40 ऐसी विधानसभा सीटों पर है, जहां आदिवासी और चाय बागान से जुड़े समुदायों का प्रभाव निर्णायक माना जाता है. इन इलाकों में लंबे समय से पहचान, अधिकार और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दे उठते रहे हैं.
HelloCities24 स्पेशल खबरों को पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें
असम में आदिवासी आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है. विभिन्न सामाजिक संगठनों के अनुमान के मुताबिक यह संख्या करीब 70 लाख के आसपास है. हालांकि आधिकारिक आंकड़ों में अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने वालों की संख्या इससे कम है. यही अंतर कई बार राजनीतिक बहस का विषय भी बनता है.
झामुमो का मानना है कि इन समुदायों के बीच भरोसा कायम कर वह एक नया जनाधार तैयार कर सकती है.
तिनसुकिया की रैली से मिला सियासी संकेत
हाल ही में तिनसुकिया जिले में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में हेमंत सोरेन की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी असम को लेकर गंभीर है. ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम के मंच से आदिवासी एकजुटता, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक अधिकारों पर जोर दिया गया.
सभा में बड़ी भीड़ जुटने को झामुमो सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहा है. पार्टी नेताओं का कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले समय में ऐसे कार्यक्रम बढ़ सकते हैं.
ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर रणनीति
असम दौरे से पहले झामुमो ने एक टीम राज्य में भेजकर जमीनी हालात का आकलन कराया. इस टीम ने स्थानीय आदिवासी संगठनों, सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय नेताओं से बातचीत की. चर्चाओं में रोजगार, शिक्षा, जमीन के अधिकार और सामाजिक पहचान जैसे मुद्दे प्रमुख रहे.
पार्टी का फोकस फिलहाल संगठन खड़ा करने और स्थानीय नेतृत्व को आगे लाने पर है, ताकि बाहरी पार्टी की छवि न बने.
चुनाव लड़ने पर अभी अंतिम फैसला नहीं
झामुमो नेतृत्व ने साफ किया है कि अभी चुनाव लड़ने को लेकर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है. पहले सामाजिक और राजनीतिक माहौल को समझा जा रहा है. पार्टी अध्यक्ष स्तर पर ही इस पर अंतिम मुहर लगेगी.
हालांकि अंदरूनी स्तर पर यह चर्चा जरूर है कि अगर माहौल अनुकूल रहा तो सीमित सीटों पर प्रयोग किया जा सकता है.
भाजपा-कांग्रेस भी सक्रिय
असम की सियासत पहले से ही बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ रही है. भाजपा जहां अपने मौजूदा जनाधार को मजबूत करने में जुटी है, वहीं कांग्रेस भी आदिवासी और चाय बागान मजदूर समुदायों के बीच सक्रियता बढ़ा रही है.
ऐसे में झामुमो की एंट्री चुनावी समीकरणों में नया फैक्टर जोड़ सकती है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भले ही पार्टी तुरंत बड़ा असर न डाले, लेकिन कुछ सीटों पर वोट प्रतिशत प्रभावित कर सकती है.
पूर्वोत्तर में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका
पूर्वोत्तर राज्यों में क्षेत्रीय पहचान और समुदाय आधारित राजनीति का असर लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में झामुमो जैसी पार्टी, जिसकी जड़ें आदिवासी राजनीति से जुड़ी हैं, यहां अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि झामुमो असम में सिर्फ राजनीतिक संदेश देना चाहती है या वाकई चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है.
इसे भी पढ़ें-टैरिफ में राहत के पीछे क्या है असली वजह?, क्या भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है?
इसे भी पढ़ें-टैक्स स्लैब में कोई बदलाव नहीं, पुरानी और नई व्यवस्था यथावत, जानें डिटेल्स
इसे भी पढ़ें-जरूरी दवाइयां, शिक्षा और घरेलू सामान सस्ते; शराब-सिगरेट महंगे, जानें और क्या प्रभावित हुआ?
इसे भी पढ़ें-आम आदमी की जेब से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक क्या बदल सकता है?


