Big Jolt to Trump Tariff: अमेरिका में व्यापार नीति को लेकर एक बड़ा संवैधानिक मोड़ सामने आया है. Supreme Court of the United States ने पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया है. इस फैसले को ट्रंप के आर्थिक एजेंडे के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि टैरिफ नीति उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ कार्यक्रम की प्रमुख धुरी रही है.
अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के तहत टैक्स और आयात शुल्क लगाने की मूल शक्ति कांग्रेस के पास निहित है, न कि राष्ट्रपति के पास. मुख्य न्यायाधीश John Roberts ने अपने मत में कहा कि संविधान निर्माताओं ने राजस्व से जुड़े अधिकार विधायिका को सौंपे हैं, इसलिए कार्यपालिका द्वारा व्यापक टैरिफ लागू करना सीमाओं से परे है.
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हालांकि, न्यायमूर्ति Samuel Alito, Clarence Thomas और Brett Kavanaugh ने असहमति जताई. असहमति रखने वाले न्यायाधीशों का मत था कि ऐतिहासिक और कानूनी दृष्टि से राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में आयात नियंत्रण के अधिकार दिए गए हैं.
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह विवाद 1977 के एक आपातकालीन कानून की व्याख्या से जुड़ा था, जिसके आधार पर ट्रंप प्रशासन ने 2025 में कई देशों पर आयात शुल्क लगाया था. प्रशासन का तर्क था कि व्यापार घाटा और आर्थिक असंतुलन राष्ट्रीय आपात स्थिति के दायरे में आते हैं.
अदालत के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति भविष्य में कभी टैरिफ नहीं लगा सकते, लेकिन अब यह स्पष्ट कर दिया गया है कि व्यापक और दीर्घकालिक शुल्क लगाने के लिए कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक होगी.
आर्थिक और राजनीतिक असर
टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका के भीतर भी मतभेद रहे हैं. आलोचकों का कहना था कि आयात शुल्क से महंगाई बढ़ी और उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ा. वहीं, समर्थकों का तर्क था कि इससे घरेलू उद्योग को सुरक्षा मिली और राजस्व में वृद्धि हुई. रिपोर्ट्स के अनुसार, इन शुल्कों से अब तक अरबों डॉलर की आमदनी हुई, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव पर बहस जारी है.
यह मामला ट्रंप के एजेंडे से जुड़ा पहला बड़ा संवैधानिक विवाद था, जो सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा. अदालत का यह फैसला कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के संतुलन को फिर से रेखांकित करता है.
भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया
भारत में भी इस फैसले पर प्रतिक्रिया देखने को मिली. कांग्रेस नेता Jairam Ramesh ने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में “चेक एंड बैलेंस” की मजबूती का उदाहरण बताया. उन्होंने कहा कि यह निर्णय दर्शाता है कि संस्थागत संतुलन किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है.
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