US Canada Relations : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां अब सिर्फ व्यापार शुल्क या विदेश नीति तक सीमित नहीं दिखतीं. हाल के वर्षों में उनका रुख कई बार ऐसा रहा है, जिससे दूसरे देशों की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगे हैं. ग्रीनलैंड को लेकर बयान, ईरान पर सख्ती, वेनेजुएला के नेतृत्व को चुनौती और कनाडा को बार-बार “51वां राज्य” कहने जैसे बयान उसी दिशा की ओर इशारा करते हैं.
इसी बीच कनाडा के पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा को लेकर सामने आई गतिविधियों ने नई चिंताओं को जन्म दिया है. आरोप है कि अमेरिका के कुछ प्रभावशाली हलकों ने अल्बर्टा में सक्रिय अलगाववादी सोच रखने वाले समूहों से संपर्क बनाए हैं.
अल्बर्टा और अलगाव की पुरानी बहस
अल्बर्टा कनाडा का ऐसा प्रांत है, जहां अलग पहचान की मांग नई नहीं है. दशकों से यहां यह तर्क दिया जाता रहा है कि संघीय सरकार ओटावा अल्बर्टा के संसाधनों से मिलने वाले राजस्व का पूरा लाभ प्रांत को नहीं देती. हालांकि, यह आंदोलन कभी मुख्यधारा में पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाया.
हाल के वर्षों में आर्थिक दबाव, ऊर्जा नीतियों और वैश्विक भू-राजनीति के चलते यह बहस फिर तेज होती दिख रही है.
अमेरिकी संपर्क और बढ़ता शक
अब जो बात कनाडा में चिंता का विषय बनी है, वह यह है कि अल्बर्टा के कुछ कट्टरपंथी अलगाववादी संगठनों के प्रतिनिधियों की अमेरिकी प्रशासन से बातचीत की खबरें सामने आई हैं. इन चर्चाओं को आधिकारिक समर्थन नहीं कहा गया है, लेकिन इतना भर भी सवाल खड़े करने के लिए काफी है कि क्या अमेरिका कनाडा के घरेलू राजनीतिक मतभेदों में रुचि ले रहा है.
कनाडाई विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के संपर्क किसी भी संप्रभु देश के लिए संवेदनशील होते हैं, खासकर तब, जब दोनों देशों के बीच पहले से व्यापार और सुरक्षा को लेकर तनाव चल रहा हो.
आर्थिक ताकत की वजह से अहम है अल्बर्टा
अल्बर्टा सिर्फ राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है. यह प्रांत कनाडा के तेल और गैस उत्पादन का केंद्र है और राष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति में इसकी भूमिका निर्णायक मानी जाती है.
अगर किसी भी परिस्थिति में अल्बर्टा कनाडा से अलग होता है, तो इसका असर केवल प्रांत या देश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तरी अमेरिकी ऊर्जा बाजार और वैश्विक सप्लाई चेन तक पहुंचेगा.
कनाडाई नेतृत्व की मुश्किलें
इस पूरे घटनाक्रम ने कनाडा की संघीय सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया है. प्रधानमंत्री माइक कार्नी का अल्बर्टा से निजी जुड़ाव इस मसले को और जटिल बनाता है. वहीं, अल्बर्टा की प्रांतीय सरकार ने आधिकारिक तौर पर अलगाव का समर्थन नहीं किया है, लेकिन जनमत-संग्रह जैसी प्रक्रियाओं पर बहस को खुला रखा है.
इसके साथ ही, कई नागरिक समूह खुलकर कनाडा की एकता के समर्थन में सामने आए हैं और किसी भी तरह के विभाजन का विरोध कर रहे हैं.
अमेरिका-कनाडा रिश्तों पर असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका शायद खुले तौर पर किसी अलगाववादी आंदोलन का समर्थन न करे, लेकिन पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत भी भरोसे को कमजोर कर सकती है. इससे अमेरिका-कनाडा के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक साझेदारी पर असर पड़ने का खतरा है.
ऊर्जा सहयोग, व्यापार समझौते और सुरक्षा तालमेल—इन सब पर ऐसे घटनाक्रमों की छाया पड़ सकती है.
आगे की तस्वीर
फिलहाल अल्बर्टा में अलगाव का समर्थन बहुमत में नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी और आंतरिक असंतोष मिलकर इस मुद्दे को बड़ा बना सकते हैं. सवाल यह नहीं है कि कनाडा तुरंत टूटेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बाहरी ताकतों की दिलचस्पी देश की आंतरिक राजनीति को और अस्थिर करेगी.
अल्बर्टा अब सिर्फ एक प्रांतीय बहस नहीं रहा—यह उत्तरी अमेरिका की राजनीति में उभरता हुआ रणनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है.
इसे भी पढ़ें-भूमध्य सागर में फ्रांस की बड़ी कार्रवाई, रूस से जुड़े तेल टैंकर को समुद्र में रोका
इसे भी पढ़ें-भूमध्य सागर में फ्रांस की बड़ी कार्रवाई, रूस से जुड़े तेल टैंकर को समुद्र में रोका


