Nimesulide Ban : केंद्र सरकार ने दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड की 100 मिलीग्राम से अधिक क्षमता वाली टैबलेट्स के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. स्वास्थ्य मंत्रालय का आकलन है कि अधिक मात्रा में यह दवा लीवर समेत शरीर के अन्य अंगों पर गंभीर दुष्प्रभाव डाल सकती है, जिससे मरीजों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ जाता है.
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया है और इसका उद्देश्य दवाओं के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करना है. प्रतिबंध का प्रभाव देशभर में तत्काल रूप से लागू होगा.
The government has banned the manufacture of the painkiller nimesulide and has also prohibited the sale of all oral formulations of this popular painkiller containing more than 100 mg. pic.twitter.com/gfw1DYUlTi
— ANI (@ANI) December 31, 2025
तकनीकी समीक्षा और कानून के तहत लागू हुआ फैसला
इस निर्णय से पहले ड्रग टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड द्वारा दवा से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों और चिकित्सकीय रिपोर्ट्स की समीक्षा की गई. बोर्ड की अनुशंसा के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 की धारा 26A का प्रयोग करते हुए यह आदेश जारी किया.
मंत्रालय के मुताबिक, दर्द और सूजन के इलाज के लिए पहले से ही कई वैकल्पिक और तुलनात्मक रूप से सुरक्षित दवाएं उपलब्ध हैं, ऐसे में उच्च डोज वाली निमेसुलाइड की जरूरत नहीं मानी गई.
बच्चों के मामले में पहले ही जताई जा चुकी है चिंता
निमेसुलाइड को लेकर सरकार पहले भी सतर्क रुख अपना चुकी है. वर्ष 2011 में 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए इस दवा के उपयोग पर रोक लगाई गई थी. उस समय निर्देश जारी किए गए थे कि किसी भी बाल रोगी के इलाज में यह दवा प्रिस्क्राइब नहीं की जाएगी.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में इसका सेवन लीवर से जुड़ी जटिलताओं का कारण बन सकता है, इसी वजह से इसे लंबे समय से संवेदनशील दवाओं की श्रेणी में रखा गया है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवालों के घेरे में दवा
निमेसुलाइड को लेकर भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कड़े कदम उठाए जा चुके हैं. यूरोप के कई देशों जैसे फिनलैंड, स्पेन, आयरलैंड और बेल्जियम में इस दवा पर वर्षों पहले ही रोक लगा दी गई थी.
इसके अलावा कनाडा, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में भी निमेसुलाइड या तो प्रतिबंधित है या इसे दवा नियामक संस्थाओं से मंजूरी नहीं मिली है. अंतरराष्ट्रीय अनुभवों को भी भारत सरकार ने इस फैसले में महत्वपूर्ण आधार माना है.
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