Ayatollah Arafi : अमेरिका और इजरायल के हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान की सियासत में बड़ा बदलाव हुआ है. देश की शीर्ष धार्मिक-राजनीतिक जिम्मेदारी फिलहाल अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को सौंपी गई है, जो कार्यवाहक सुप्रीम लीडर के रूप में व्यवस्था संभालेंगे.
ईरान के इतिहास में अब तक केवल दो स्थायी सुप्रीम लीडर रहे हैं—पहले 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सत्ता संभालने वाले अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी और उनके बाद लंबे समय तक नेतृत्व करने वाले अयातुल्ला अली खामेनेई.
कौन है अलीरेजा अराफी?
67 वर्षीय अयातुल्ला अलीरेजा अराफी धार्मिक जगत के वरिष्ठ विद्वान माने जाते हैं. उन्हें खामेनेई का करीबी माना जाता रहा है. ईरानी स्टूडेंट्स न्यूज एजेंसी (ISNA) के अनुसार, अराफी को लीडरशिप काउंसिल में ज्यूरिस्ट सदस्य के रूप में शामिल किया गया है.
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तीन सदस्यों वाली इस अस्थायी परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और न्यायपालिका प्रमुख घोलमहुसैन मोहसेनी एजेई भी शामिल हैं. अराफी फिलहाल असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के उपाध्यक्ष हैं—यह वही संस्था है जो सुप्रीम लीडर की नियुक्ति करती है और उसके कामकाज की निगरानी करती है.
सुप्रीम लीडर का पद खाली होने पर क्या होता है?
ईरान के संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि सुप्रीम लीडर का पद किसी कारणवश रिक्त हो जाता है, तो अस्थायी तौर पर एक लीडरशिप काउंसिल कार्यभार संभालती है. इस परिषद में राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल का एक ज्यूरिस्ट सदस्य शामिल होता है.
अराफी की नियुक्ति इसी ज्यूरिस्ट सदस्य के रूप में की गई है. उनका दायित्व यह सुनिश्चित करना होगा कि शासन से जुड़े सभी निर्णय इस्लामी कानून और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हों.
ईरान में सुप्रीम लीडर न केवल देश के सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी होते हैं, बल्कि वे सेना के कमांडर-इन-चीफ भी होते हैं. इसके साथ ही प्रभावशाली रिवोल्यूशनरी गार्ड पर भी उनका सीधा प्रभाव रहता है. ऐसे में कार्यवाहक सुप्रीम लीडर की भूमिका राजनीतिक और सामरिक—दोनों दृष्टियों से बेहद अहम मानी जा रही है.
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