Jharkhand News: फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ और ‘बस्तर’ से चर्चा में आए फिल्मकार सुदीप्तो सेन इन दिनों अपनी नई फिल्म ‘चरक’ को लेकर सुर्खियों में हैं. इस फिल्म में उन्होंने निर्माता की भूमिका निभाई है. हाल ही में बातचीत के दौरान उन्होंने फिल्म की कहानी, सेंसर प्रक्रिया और झारखंड में हुए शूटिंग अनुभव को लेकर कई दिलचस्प बातें साझा कीं.
सेंसर प्रक्रिया को लेकर बढ़ी थी चिंता
सुदीप्तो सेन ने बताया कि फिल्म ‘चरक’ को लेकर सेंसर बोर्ड में काफी चर्चा और लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. शुरुआती दौर में बोर्ड को यह आशंका थी कि फिल्म के विषय को लेकर कहीं किसी तरह की प्रतिक्रिया न हो जाए. इसी वजह से सर्टिफिकेट मिलने में समय लगा.
उन्होंने कहा कि फिल्म का उद्देश्य किसी भी धर्म या आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं है. उनके अनुसार कहानी समाज में मौजूद कुछ पाखंड और कुरीतियों पर सवाल उठाती है. उनका मानना है कि जो भी दर्शक फिल्म को समझदारी से देखेंगे, उन्हें इसमें किसी धार्मिक भावना को आहत करने वाली बात नहीं लगेगी.
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परंपरा और अंधविश्वास के बीच की कहानी
सुदीप्तो सेन के मुताबिक फिल्म ‘चरक’ की कहानी पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में मनाए जाने वाले एक पारंपरिक उत्सव की पृष्ठभूमि से जुड़ी है. बंगाल, ओडिशा और झारखंड के कई इलाकों में यह पर्व लंबे समय से मनाया जाता रहा है.
उन्होंने बताया कि बचपन में उन्होंने इस उत्सव को बहुत करीब से देखा है. इसमें आस्था, परंपरा और सामुदायिक भावना के कई सकारात्मक पहलू हैं. लेकिन समय के साथ कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं जिनसे समाज में सवाल खड़े होते हैं. फिल्म की कहानी इन्हीं विरोधाभासों को दिखाने की कोशिश करती है.
निर्माता बनने का अनुभव रहा चुनौतीपूर्ण
इस फिल्म के साथ सुदीप्तो सेन पहली बार निर्माता की भूमिका में भी नजर आए हैं. उन्होंने माना कि यह अनुभव उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा.
उनके अनुसार निर्माता बनने के बाद फिल्म के हर छोटे-बड़े फैसले की जिम्मेदारी होती है. उन्होंने कहा कि अक्सर हिंदी सिनेमा में सुरक्षित और प्रचलित विषयों पर ज्यादा फिल्में बनती हैं, लेकिन उन्होंने कुछ अलग करने की कोशिश की.
उन्होंने यह भी बताया कि निर्माता की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा थीं कि इस फिल्म का निर्देशन उन्होंने अपने करीबी सहयोगी शिलादित्य को सौंप दिया.
देवघर के गांवों में हुई फिल्म की शूटिंग
फिल्म की शूटिंग का एक हिस्सा झारखंड में भी किया गया. सुदीप्तो सेन के अनुसार देवघर के आसपास के कुछ गांवों में करीब 20 दिनों तक फिल्मांकन चला.
उन्होंने बताया कि देवघर एयरपोर्ट से करीब 16 से 17 किलोमीटर दूर स्थित गांवों में पूरी टीम ने काम किया. शूटिंग से पहले कई लोगों ने उन्हें झारखंड में संभावित परेशानियों को लेकर डराया भी था, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उनका अनुभव बिल्कुल अलग रहा.
पुलिस और स्थानीय लोगों ने किया पूरा सहयोग
सुदीप्तो सेन ने कहा कि झारखंड पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने टीम को पूरा सहयोग दिया. शूटिंग के दौरान कई बार देर रात तक काम चलता था और टीम सुबह के समय होटल लौटती थी, लेकिन किसी तरह की समस्या सामने नहीं आई.
उन्होंने यह भी बताया कि एक दृश्य को लेकर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई थी, लेकिन आसपास के गांवों के कई लोगों ने खुद आगे आकर टीम की मदद करने की पेशकश की.
सुदीप्तो सेन के अनुसार झारखंड के लोगों का सहयोग और अपनापन उन्हें काफी प्रभावित कर गया. उनका कहना है कि अगर मौका मिला तो वह भविष्य में भी अपनी फिल्मों की शूटिंग झारखंड में करना चाहेंगे.
‘केरल स्टोरी’ के दूसरे भाग से दूरी
सुदीप्तो सेन ने यह भी बताया कि वह ‘केरल स्टोरी’ के दूसरे भाग से क्यों नहीं जुड़े. उनके अनुसार उन्हें निर्देशन का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया.
उनका कहना है कि दूसरी फिल्म की कहानी अलग राज्यों की पृष्ठभूमि से जुड़ी है. ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने के लिए गहराई से शोध जरूरी होता है. बिना पर्याप्त अध्ययन के संवेदनशील विषयों पर फिल्म बनाना सही नहीं होगा.
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