US Iran Ceasefire: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिन के युद्धविराम पर सहमति बनने के बाद भी हालात सामान्य नहीं दिख रहे हैं. सैन्य टकराव भले फिलहाल रुका हुआ हो, लेकिन दोनों देशों के बीच अविश्वास और तनाव पहले जैसा ही बना हुआ है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के खिलाफ सख्त रुख दिखाया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर समझौते की शर्तें टूटीं या किसी भी तरह की चालबाजी हुई, तो अमेरिका इस बार और ज्यादा जोरदार हमला करेगा. ट्रंप के बयान ने साफ कर दिया है कि सीजफायर के बावजूद वॉशिंगटन अभी पीछे हटने के मूड में नहीं है. अमेरिका ने यह संकेत भी दिया है कि अंतिम समझौता होने तक सैन्य दबाव और रणनीतिक घेराबंदी दोनों जारी रहेंगे.
ट्रंप का साफ संदेश, परमाणु ताकत बनने नहीं देंगे
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल के जरिए ईरान को लेकर सख्त संदेश दिया. उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपने जहाज, विमान और सैनिकों को ईरान के आसपास तैनात रखा है ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत जवाब दिया जा सके. ट्रंप ने दो टूक कहा कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान को परमाणु शक्ति बनने नहीं देगा.
उनके बयान से यह साफ हुआ कि वॉशिंगटन इस पूरे मामले को सिर्फ युद्धविराम तक सीमित नहीं मान रहा, बल्कि वह ईरान की हर गतिविधि पर करीबी नजर बनाए रखना चाहता है. ट्रंप का यह भी संकेत था कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी, जब ईरान पूरी तरह अमेरिकी शर्तों के मुताबिक व्यवहार करेगा. यानी कागज पर शांति की बात हो रही है, लेकिन जमीन पर ताकत का प्रदर्शन अब भी जारी है.

होर्मुज को लेकर अमेरिका ने दिखाई सख्ती
ट्रंप ने अपने बयान में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी साफ रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि यह रास्ता पूरी तरह खुला और सुरक्षित रहना चाहिए. इस बयान का सीधा मतलब यह है कि अमेरिका होर्मुज पर किसी भी तरह के ईरानी दबाव या नियंत्रण को स्वीकार करने के मूड में नहीं है.
होर्मुज दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई गुजरती है. ऐसे में इस इलाके को लेकर किसी भी तरह का तनाव वैश्विक असर डाल सकता है. ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना पूरी तरह तैयार है और अगली कार्रवाई के लिए सक्षम स्थिति में है. इससे यह साफ हो गया कि युद्धविराम के बावजूद पश्चिम एशिया में सैन्य बेचैनी खत्म नहीं हुई है.
14 दिन का सीजफायर, लेकिन भरोसा अभी भी दूर
अमेरिका और ईरान के बीच जो 14 दिन का युद्धविराम हुआ है, उसे फिलहाल स्थायी शांति की शुरुआत नहीं माना जा रहा. दोनों देशों ने संघर्ष रोकने पर सहमति तो जताई है, लेकिन समझौते की शर्तों को लेकर तस्वीर अब भी धुंधली बनी हुई है. यही वजह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं और कोई भी पूरी तरह दूसरे की बात पर भरोसा करता नहीं दिख रहा.
यह युद्धविराम ज्यादा एक अस्थायी राहत जैसा नजर आ रहा है, जिसमें दोनों देश फिलहाल सीधे टकराव से बचना चाहते हैं. लेकिन जिस तरह से बयानबाजी जारी है, उससे यह भी साफ है कि यह ठहराव कभी भी टूट सकता है. इसलिए इस सीजफायर को शांति से ज्यादा रणनीतिक विराम के तौर पर देखा जा रहा है.
ईरान की शर्तें अलग, अमेरिका का दावा अलग
समझौते को लेकर ईरान और अमेरिका की व्याख्या एक जैसी नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान का कहना है कि उसे होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर टोल लगाने की अनुमति मिलेगी. साथ ही उसने यह भी संकेत दिया है कि यूरेनियम संवर्धन का उसका कार्यक्रम जारी रह सकता है.
ईरान की मांगों में क्षेत्र से अमेरिकी सेना की वापसी, आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना और जब्त संपत्तियों की वापसी भी शामिल बताई जा रही है. दूसरी ओर, ट्रंप ने पहले दावा किया था कि ईरान ने एक स्वीकार्य 10-सूत्री प्रस्ताव दिया है. लेकिन जब ईरान की ओर से अलग तरह की शर्तें सामने आईं, तो ट्रंप ने उसे धोखाधड़ी करार दिया. यही विरोधाभास इस पूरे समझौते को और ज्यादा अस्थिर बना रहा है.
सीजफायर के बाद भी टकराव की आशंका बरकरार
फिलहाल भले ही दोनों देशों के बीच गोलीबारी या सैन्य हमले रुके हों, लेकिन हालात अभी भी बेहद संवेदनशील बने हुए हैं. ट्रंप की ताजा धमकी ने साफ कर दिया है कि अमेरिका किसी भी वक्त फिर से आक्रामक रुख अपना सकता है. दूसरी तरफ ईरान भी अपने रणनीतिक हितों से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा.
ऐसे में 14 दिन का यह युद्धविराम केवल समय खरीदने जैसा कदम नजर आ रहा है. अगर इस दौरान किसी ठोस समझौते पर बात नहीं बनी, तो पश्चिम एशिया में फिर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है. दुनिया की नजरें अब सिर्फ सीजफायर पर नहीं, बल्कि इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देशों की अगली चाल क्या होगी.
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