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हवा में बढ़ती नमी क्यों बढ़ा रही है जान को खतरा? समझिए ह्यूमिड हीट का असर

Humid Heat Threat : बढ़ता तापमान और हवा में नमी का स्तर अब लोगों के स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बनता जा रहा है. वैज्ञानिक इसे ह्यूमिड हीट का खतरा बता रहे हैं, जो शरीर की प्राकृतिक ठंडक प्रणाली को प्रभावित कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे दिनों की संख्या पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है.

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Humid Heat Threat : जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम के बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है. बढ़ते तापमान के साथ हवा में नमी का स्तर भी कई इलाकों में लगातार बढ़ रहा है, जिससे “ह्यूमिड हीट” का खतरा तेजी से बढ़ने लगा है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थिति सामान्य गर्मी की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें शरीर खुद को सामान्य तरीके से ठंडा नहीं रख पाता.

क्या होती है ह्यूमिड हीट?

जब अधिक तापमान और अत्यधिक आर्द्रता एक साथ मौजूद होती है, तब उसे ह्यूमिड हीट कहा जाता है. सामान्य परिस्थितियों में शरीर से निकलने वाला पसीना वाष्प बनकर उड़ जाता है और शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है. लेकिन हवा में नमी अधिक होने पर पसीना सूख नहीं पाता, जिससे शरीर का प्राकृतिक शीतलन तंत्र प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाता.

वेट-बल्ब तापमान से समझा जाता है खतरा

वैज्ञानिक इस स्थिति का आकलन वेट-बल्ब तापमान के आधार पर करते हैं. यह तापमान और आर्द्रता का संयुक्त माप होता है, जिससे यह पता चलता है कि शरीर पसीने के माध्यम से खुद को कितना ठंडा रख सकता है. क्लाइमेट सेंट्रल के अनुसार, यदि वेट-बल्ब तापमान 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाए तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे की स्थिति मानी जाती है.

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पहले की तुलना में दोगुने से ज्यादा बढ़े ऐसे दिन

क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 के दशक के बाद दुनिया भर में खतरनाक ह्यूमिड हीट वाले दिनों की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई है. पहले जहां साल में औसतन 10 दिन ऐसी स्थिति बनती थी, वहीं अब यह बढ़कर 23 दिन तक पहुंच गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे लगभग 83 प्रतिशत मामलों के पीछे मानवीय गतिविधियां और प्रदूषण प्रमुख कारण हैं.

पश्चिम बंगाल के कई जिले ज्यादा प्रभावित

भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पश्चिम बंगाल में हवा में नमी का स्तर सामान्य रूप से अधिक रहता है. हुगली नदी, बंगाल की खाड़ी और सुंदरवन क्षेत्र की वजह से कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर जैसे जिले ह्यूमिड हीट के लिहाज से अधिक संवेदनशील माने जा रहे हैं. मानसून से पहले और उसके बाद यहां उमस भरी गर्मी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है.

तिरुनेलवेली सबसे आगे, कोलकाता और मुंबई भी सूची में

रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु का तिरुनेलवेली शहर देश में सबसे अधिक ह्यूमिड हीट वाले दिनों का सामना करता है, जहां साल में औसतन 273 दिन ऐसी स्थिति रहती है. इसके बाद चेन्नई में 257 और तिरुचिरापल्ली में 251 दिन दर्ज किए गए हैं. कोलकाता और मुंबई में भी साल के 200 से अधिक दिन लोगों को उमस भरी गर्मी का सामना करना पड़ता है.

Humid Heat Climate Change Threat: घरों के भीतर भी नहीं मिल रही राहत

क्लाइमेट ट्रेंड्स के अध्ययन में पाया गया कि निम्न और मध्यम आय वर्ग के कई घरों के भीतर भी तापमान लगातार 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहता है. चेन्नई और कोलकाता जैसे घनी आबादी वाले शहरों में लोग साल के लगभग 3,000 से 5,000 घंटे तक अपने घरों के अंदर भी इसी तरह के वातावरण में रहने को मजबूर हैं.

महिलाओं और बाहरी काम करने वालों पर अधिक असर

विशेषज्ञों के अनुसार, 50 वर्ष से अधिक आयु की कामकाजी महिलाएं, जो मेनोपॉज के दौरान हॉट फ्लैश जैसी समस्याओं से गुजर रही होती हैं, उनके लिए यह मौसम अतिरिक्त चुनौती बन सकता है. वहीं सुंदरवन और दक्षिण बंगाल के मछुआरे, किसान तथा निर्माण कार्य से जुड़े श्रमिकों के लिए भी यह स्थिति कामकाजी जोखिम का रूप ले चुकी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि अब गर्मी का असर फरवरी से ही महसूस होने लगा है.

बढ़ती बिजली खपत भी बनी चुनौती

कोलकाता जैसे शहरों में तेजी से बढ़ते कंक्रीट निर्माण ने अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव को और बढ़ाया है. दिनभर गर्मी सोखने वाले शहर रात में भी जल्दी ठंडे नहीं हो पाते. ऐसे में एसी और कूलर का इस्तेमाल बढ़ने से बिजली की मांग भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच रही है. भारत में पीक बिजली खपत 270 गीगावॉट तक दर्ज की जा चुकी है, जिससे कई बार बिजली आपूर्ति प्रभावित होती है.

कूलिंग सुविधा में बढ़ी असमानता

रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति ने आर्थिक असमानता को भी सामने रखा है. जहां सीमित संख्या में लोग एयर कंडीशनर और अन्य साधनों के जरिए राहत पा रहे हैं, वहीं बड़ी आबादी के पास उमस भरी गर्मी से बचने के पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं.

विशेषज्ञों ने बताया गंभीर स्वास्थ्य चुनौती

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ह्यूमिड हीट को अब केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं माना जा सकता. इसके कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय संबंधी समस्याओं और किडनी फेलियर जैसे मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. जून और जुलाई के दौरान अस्पतालों के आपातकालीन वार्डों में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ जाती है.

शहरी योजना में बदलाव की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल पर्यावरण संरक्षण की नीतियां पर्याप्त नहीं होंगी. शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने, सार्वजनिक स्थानों पर कूलिंग शेल्टर विकसित करने और बाहरी श्रमिकों के कार्य समय में बदलाव जैसे कदमों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है.

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सोनी कुमारी
सोनी कुमारी
सोनी कुमारी डिजिटल मीडिया क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार हैं और Hellocities24 में ऑथर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार समेत देशभर की ताजा खबरों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करती हैं. सरल भाषा और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पहचान मानी जाती है. डिजिटल पत्रकारिता में समाचार लेखन और कंटेंट प्रेजेंटेशन का अच्छा अनुभव है. पाठकों तक तेज और भरोसेमंद खबरें पहुंचाना प्रमुख उद्देश्य है.
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