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भूकंप से कांपा जापान, लेकिन तबाही नहीं; जानिए इसकी सबसे बड़ी वजह

Japan Earthquake Preparedness: 7.1 तीव्रता के भूकंप के बाद भी जापान में बड़े पैमाने पर तबाही नहीं हुई. इसकी वजह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि भूकंपरोधी निर्माण, अर्ली वार्निंग सिस्टम और लोगों की तैयारी है. जानिए जापान का आपदा प्रबंधन मॉडल क्यों पूरी दुनिया के लिए मिसाल माना जाता है.

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Japan Earthquake Preparedness: 7.1 तीव्रता के भूकंप के बाद भी जापान में बड़े पैमाने पर तबाही नहीं हुई. इसकी वजह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि भूकंपरोधी निर्माण, अर्ली वार्निंग सिस्टम और लोगों की तैयारी है. जानिए जापान का आपदा प्रबंधन मॉडल क्यों पूरी दुनिया के लिए मिसाल माना जाता है.

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Japan Earthquake: जापान में 7.1 तीव्रता का भूकंप… किसी भी देश के लिए यह खबर डराने वाली हो सकती है. लेकिन जब यही झटके जापान में आते हैं, तो तस्वीर अक्सर अलग होती है. इमारतें हिलती हैं, बुलेट ट्रेनें रुक जाती हैं, अलर्ट बजने लगते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर तबाही नहीं होती. सवाल यही है कि आखिर जापान ऐसा क्या करता है, जो दुनिया के दूसरे देशों के लिए अब भी चुनौती बना हुआ है?

भूकंप आते ही कुछ सेकंड में पूरा सिस्टम हो जाता है एक्टिव

जापान की सबसे बड़ी ताकत उसका अर्ली अर्थक्वेक वार्निंग सिस्टम है. देशभर में लगे हजारों सेंसर जमीन की हलचल पर हर पल नजर रखते हैं. शुरुआती भूकंपीय तरंगें मिलते ही कुछ सेकंड के भीतर मोबाइल फोन, टीवी, रेडियो और सार्वजनिक प्रसारण प्रणाली पर अलर्ट पहुंच जाता है.

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इसी दौरान बुलेट ट्रेनें अपने आप रुक जाती हैं, गैस सप्लाई बंद हो जाती है, परमाणु संयंत्र सुरक्षा मोड में चले जाते हैं और लिफ्टें नजदीकी मंजिल पर रुक जाती हैं. यही कुछ सेकंड हजारों लोगों की जान बचाने में सबसे अहम साबित होते हैं.

Japan Earthquake: इमारतें टूटने के लिए नहीं, झटके सहने के लिए बनाई जाती हैं

जापान में भवन निर्माण के नियम दुनिया के सबसे सख्त माने जाते हैं. नई इमारतों में बेस आइसोलेशन, शॉक एब्जॉर्बर और फ्लेक्सिबल स्ट्रक्चर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है. इसलिए तेज भूकंप आने पर भी अधिकांश इमारतें गिरने के बजाय केवल झटके सहती हैं.

सरकार पुराने भवनों को भी समय-समय पर आधुनिक भूकंपरोधी मानकों के अनुसार मजबूत कराती रहती है.

सिर्फ तकनीक नहीं, लोग भी हमेशा रहते हैं तैयार

जापान की सफलता का सबसे बड़ा राज सिर्फ मशीनें नहीं, बल्कि वहां के नागरिक भी हैं. स्कूलों से लेकर दफ्तरों तक नियमित मॉक ड्रिल होती है. बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है कि भूकंप आने पर क्या करना है और क्या नहीं.

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ज्यादातर परिवारों के घरों में पहले से इमरजेंसी किट मौजूद रहती है, जिसमें पानी, दवाइयां, टॉर्च, बैटरी और जरूरी सामान रखा जाता है. इसलिए आपदा आने पर अफरा-तफरी कम और अनुशासन ज्यादा दिखाई देता है.

दुनिया के सबसे खतरनाक भूकंप क्षेत्र में है जापान

जापान प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ पर स्थित है, जहां दुनिया की सबसे सक्रिय टेक्टोनिक प्लेटें मौजूद हैं. इसी वजह से यहां हर साल हजारों छोटे-बड़े भूकंप दर्ज होते हैं. इसके बावजूद बड़े स्तर पर नुकसान अपेक्षाकृत कम होता है, क्योंकि देश ने आपदाओं के साथ जीने की तैयारी को अपनी व्यवस्था का हिस्सा बना लिया है.

भारत क्या सीख सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के हिमालयी राज्यों, दिल्ली-एनसीआर, गुजरात और पूर्वोत्तर जैसे भूकंप संवेदनशील क्षेत्रों में भी जापान की तरह सख्त बिल्डिंग कोड, आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम, नियमित मॉक ड्रिल और लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जाए तो भविष्य में भूकंप से होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है.

जापान क्यों माना जाता है भूकंप से निपटने में सबसे तैयार?

  • ‘रिंग ऑफ फायर’ पर स्थित होने के बावजूद मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था.
  • हर साल हजारों छोटे-बड़े भूकंप दर्ज होते हैं.
  • दुनिया के सबसे सख्त भूकंपरोधी बिल्डिंग कोड लागू हैं.
  • देशभर में अर्ली अर्थक्वेक वार्निंग सिस्टम सक्रिय है.
  • बुलेट ट्रेन, गैस सप्लाई और परमाणु संयंत्र खतरा महसूस होते ही स्वतः सुरक्षा मोड में चले जाते हैं.
  • स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक संस्थानों में नियमित मॉक ड्रिल कराई जाती है.
  • अधिकांश परिवारों के पास इमरजेंसी किट पहले से तैयार रहती है.
  • सरकार समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाती है, जिससे लोग आपदा के समय घबराने के बजाय तय सुरक्षा नियमों का पालन करते हैं.

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सोनी कुमारी
सोनी कुमारी
सोनी कुमारी डिजिटल मीडिया क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार हैं और Hellocities24 में ऑथर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार समेत देशभर की ताजा खबरों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करती हैं. पाठकों तक तेज और भरोसेमंद खबरें पहुंचाना प्रमुख उद्देश्य है.
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