Janmashtami 2026: आज जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है. पंचांग के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर निशीथ काल में पूजा के लिए 46 मिनट का समय मिलेगा. 4 सितंबर को मध्यरात्रि 11 बजकर 26 मिनट से 12 बजकर 12 मिनट तक निशीथ काल की पूजा का मुहूर्त है. वहीं वृषभ लग्न रात 9 बजकर 43 मिनट से 11 बजकर 40 मिनट तक रहेगा.
इस बार 5253वां श्रीकृष्ण जन्मोत्सव
इस वर्ष भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अवतार लिया था. उनका प्राकट्य मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था. श्रीकृष्ण की माता देवकी और पिता वसुदेव थे, जबकि उनका पालन-पोषण नंदबाबा और यशोदा के यहां हुआ.
Janmashtami 2026: व्रत से पहले रखें इन बातों का ध्यान
शास्त्रों के अनुसार, जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को पर्व से एक दिन पहले ही खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए. एक दिन पहले लहसुन-प्याज, नॉनवेज और शराब जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए. इस दिन सात्विक भोजन करने की सलाह दी गई है.
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पूजा स्थल को भी पहले से साफ-सुथरा कर लेना चाहिए. जन्माष्टमी की पूजा के लिए जरूरी सामग्री एक दिन पहले ही जुटा लेनी चाहिए, ताकि शरीर और मन व्रत और पूजा के लिए तैयार रहे.
जन्माष्टमी की पूजा के लिए क्या-क्या चाहिए?
- श्री कृष्ण की मूर्ति या तस्वीर
- झूला या सिंहासन
- पंचामृत के लिए सामग्री (गाय का कच्चा दूध, दही, गाय का शुद्ध घी, शहद, गंगाजल)
- मुकुट (पीले रंग का)
- वस्त्र
- मोरपंख
- बांसुरी
- वैजयंती माला
- चंदन
- अक्षत
- रोली
- अष्टगंध
- माखन-मिश्री
- कुंडल
- कड़ा
- लकड़ी की चौकी
- लाल या पीला कपड़ा
- दीपक
- बाती
- कपूर
- माचिस
- कलश
- ताजे फूल
- तुलसी के पत्ते
- शंख
- खीर
- धनिया पंजीरी
- पंचमेवा (काजू, किशमिश, मखाना, बादाम और छुहारा)
- मौसम के अनुकूल फल (केला, सेब, नारंगी, अमरूद इत्यादि)
कान्हा को भोग लगाते समय न भूलें तुलसी
कान्हा जी को माखन-मिश्री का भोग अत्यंत प्रिय माना गया है. भोग में तुलसी का पत्ता जरूर डालना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके बिना श्रीकृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है.
जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी लीला से जुड़ी कथा का पाठ करना चाहिए या उसे सुनना-देखना चाहिए. इसके अलावा इस दिन भजन-कीर्तन भी करना चाहिए. इन कार्यों से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और व्रत का शुभ फल प्राप्त होता है.
पूजा में जरूर रखें मोरपंख
श्रीकृष्ण के स्वरूप में मोरपंख का विशेष महत्व माना जाता है. जन्माष्टमी की पूजा के दौरान बाल गोपाल को मोरपंख अर्पित किया जा सकता है या उनके मुकुट में लगाया जा सकता है. धार्मिक मान्यताओं में मोरपंख को शुभता और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है.
जन्माष्टमी पर बन रहा ग्रहों का अद्भुत संयोग
ज्योतिष शास्त्र के जानकार पं. धनंजय पांडेय के अनुसार, इस वर्ष जन्माष्टमी पर ग्रहों का अद्भुत संयोग बनने वाला है. जन्माष्टमी के दिन चंद्रमा वृषभ राशि में रहेगा. वहीं बृहस्पति कर्क राशि में मौजूद रहेगा. कर्क बृहस्पति की उच्च राशि है. इसके अलावा जन्माष्टमी पर शुक्र भी अपनी उच्च राशि तुला में रहेगा.
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शहरवार निशीथ काल की पूजा का मुहूर्त
| शहर | निशीथ पूजा मुहूर्त |
|---|
| पुणे | 12:10 ए एम से 12:57 ए एम, 05 सितम्बर |
| नई दिल्ली | 11:57 पी एम से 12:43 ए एम, 05 सितम्बर |
| चेन्नई | 11:45 पी एम से 12:31 ए एम, 05 सितम्बर |
| जयपुर | 12:03 ए एम से 12:49 ए एम, 05 सितम्बर |
| हैदराबाद | 11:52 पी एम से 12:38 ए एम, 05 सितम्बर |
| गुरुग्राम | 11:58 पी एम से 12:44 ए एम, 05 सितम्बर |
| चंडीगढ़ | 11:59 पी एम से 12:45 ए एम, 05 सितम्बर |
| कोलकाता | 11:13 पी एम से 11:59 पी एम |
| मुंबई | 12:14 ए एम से 01:01 ए एम, 05 सितम्बर |
| बेंगलुरु | 11:55 पी एम से 12:42 ए एम, 05 सितम्बर |
| अहमदाबाद | 12:16 ए एम से 01:02 ए एम, 05 सितम्बर |
| नोएडा | 11:57 पी एम से 12:42 ए एम, 05 सितम्बर |
श्रीकृष्ण की भक्ति में असीम शक्ति
- भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में असीम शक्ति मानी जाती है. इसका उदाहरण उनके गरीब मित्र सुदामा से जुड़ी कथा में मिलता है. सुदामा की दयनीय स्थिति को देखकर श्रीकृष्ण ने उन्हें बिना बताए धनवान बना दिया.
- विदुर जी की श्रीकृष्ण भक्ति का भी उदाहरण दिया जाता है. महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले श्रीकृष्ण उनके घर पहुंचे और रुखा-सूखा भोजन किया, जबकि कौरवों ने उनके लिए अपने घर पर 56 प्रकार के भोग बनाये हुए थे.
- द्रौपदी की कथा भी श्रीकृष्ण भक्ति से जुड़ी है. द्रौपदी ने उन्हें केवल एक चावल का दाना और साग खिलाकर भाई बनाया और श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त की रक्षा की.
- इसी तरह मीरा की भक्ति का उदाहरण भी दिया जाता है. कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की भक्ति के फलस्वरूप मीरा ने अंततः उन्हें प्राप्त कर लिया. ऐसे कई उदाहरण और प्रकरण हैं, जो श्रीकृष्ण की भक्ति की शक्ति को दर्शाते हैं.
कृष्ण आरती (Krishna Aarti)
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक
ललित छवि श्यामा प्यारी की।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
आरती कुंजबिहारी की।।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग
अतुल रति गोप कुमारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच
चरन छवि श्रीबनवारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।।
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।।
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद
टेर सुन दीन भिखारी की।
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।।
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।।
क्यों मनाते हैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी?
श्रीकृष्ण का जन्म भगवान श्रीविष्णु के आठवें अवतार के रूप में हुआ था. इसी अवसर की स्मृति में कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है. मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय हुआ था.
जन्मोत्सव पर कृष्णमय होगी मथुरा
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए ग्रामीण इलाकों से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं. जन्मोत्सव के दौरान पूरी मथुरा और वहां पहुंचे श्रद्धालु कृष्णमय हो जाते हैं.
मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है. मथुरा में जन्माष्टमी के दिन महिलाएं और पुरुष रात 12 बजे तक व्रत रखते हैं. मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है. इसके साथ ही रासलीला का आयोजन भी होता है.
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