ISRO NVS-03 Satellite Launch : 1999 के कारगिल युद्ध में भारत को एक ऐसी तकनीकी कमी का एहसास हुआ था, जिसने आगे चलकर देश की अंतरिक्ष रणनीति की दिशा बदल दी. उस समय भारत ने अमेरिका से GPS की सैन्य स्तर की जानकारी मांगी थी, लेकिन मदद देने से इनकार कर दिया गया. इसके बाद भारत ने अपनी स्वतंत्र सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली विकसित करने की दिशा में प्रयास तेज किए.
अब इसी स्वदेशी व्यवस्था NavIC को और मजबूत करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने NVS-03 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा है.
शुक्रवार, 30 अक्टूबर की देर रात हुए इस प्रक्षेपण के साथ भारत ने रक्षा और नागरिक जरूरतों के लिए अपनी नेविगेशन क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक और कदम उठाया है. NavIC के जरिए भारतीय सेना को देश की सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक सटीक लोकेशन और नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराने की क्षमता मजबूत होगी.
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#WATCH | GSLV-F18/NVS-03 Mission | GSLV-F18 rocket lifts off from Satish Dhawan Space Centre in Sriharikota.The GSLV-F18 vehicle will place NVS-03 satellite into a Geosynchronous Transfer Orbit. NVS-03 is the third satellite in next generation navigation satellite system envisaged for providing continuity of navigation services for IRNSS series. The satellite carries Indigenous Atomic clock, along with the procured Atomic clocks. It also includes L1 signal in addition to existing L5/S signals with Coverage over India land mass and a region extending 1500 km around Indian geopolitical boundary.(Video: ISRO)
— ANI (@ANI) October 30, 2026
कारगिल की चुनौती से पैदा हुई स्वदेशी NavIC की जरूरत
भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली विकसित करने के पीछे 1999 के कारगिल युद्ध का अनुभव एक बड़ी वजह रहा. युद्ध के दौरान भारतीय सेना को दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियों के लिए सटीक लोकेशन की आवश्यकता थी. उस समय भारत के पास अपना स्वतंत्र सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम नहीं था.
भारत ने अमेरिका से GPS की सैन्य स्तर की जानकारी और सहायता मांगी थी, लेकिन अमेरिका ने इनकार कर दिया. इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी दूसरे देश की तकनीक पर पूरी तरह निर्भर रहना मुश्किल पैदा कर सकता है.
इसके बाद भारत ने इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) विकसित करने का काम शुरू किया. इसी प्रणाली को बाद में NavIC नाम दिया गया. इसका उद्देश्य भारत को लोकेशन, नेविगेशन और सटीक समय की जानकारी के लिए अपनी स्वतंत्र व्यवस्था उपलब्ध कराना है.
20 मिनट में 2,232 किलो के सैटेलाइट को कक्षा में पहुंचाया
ISRO ने 30 अक्टूबर की रात 11 बजकर 51 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से GSLV-F18 रॉकेट का प्रक्षेपण किया. लगभग 20 मिनट की उड़ान के बाद रॉकेट ने 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया.
इसरो प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने मिशन की सफलता की घोषणा करते हुए वैज्ञानिकों और उद्योग जगत से जुड़े लोगों को बधाई दी. GSLV रॉकेट की यह 20वीं उड़ान थी.
NVS-03 दूसरी पीढ़ी की NavIC सैटेलाइट श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है. इसे भारत की स्वदेशी नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता और उपलब्धता बेहतर बनाने के उद्देश्य से लॉन्च किया गया है.
सीमा से 1,500 किलोमीटर आगे तक काम करेगी NavIC
NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है. यह भारत की स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली है. इसकी सेवाएं भारत की मुख्य भूमि के साथ देश की सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र के लिए निर्धारित हैं.
इस प्रणाली से सेना और सुरक्षा एजेंसियों को सैन्य गतिविधियों, परिवहन और लोकेशन से जुड़ी जरूरतों में मदद मिल सकती है. आपातकालीन परिस्थितियों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
हालांकि, NavIC को दुश्मन की स्थिति बताने वाला रडार या निगरानी प्रणाली समझना सही नहीं होगा. इसका मुख्य काम सैटेलाइट के माध्यम से सटीक लोकेशन, नेविगेशन और समय संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना है. इसकी रणनीतिक अहमियत इसलिए है, क्योंकि भारत अपनी जरूरतों के लिए विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम कर सकता है.
परमाणु घड़ी और L1 सिग्नल से बढ़ेगी तकनीकी क्षमता
NVS-03 में स्वदेशी परमाणु घड़ी (Atomic Clock) लगाई गई है. सैटेलाइट नेविगेशन में समय की सटीकता बेहद जरूरी होती है. सैटेलाइट से प्राप्त सिग्नल के समय के अंतर के आधार पर ही किसी स्थान की स्थिति निर्धारित की जाती है.
इस उपग्रह में L1 फ्रीक्वेंसी सिग्नल की सुविधा भी है. NavIC की मौजूदा व्यवस्था में L5 और S-बैंड सिग्नल का इस्तेमाल किया जा रहा है. L1 सिग्नल जुड़ने से आधुनिक नेविगेशन रिसीवर और उपभोक्ता उपकरणों के साथ इसकी अनुकूलता बढ़ने की उम्मीद है.
इसका लाभ भविष्य में स्मार्टफोन, वाहनों और दूसरे नेविगेशन उपकरणों में NavIC के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में मिल सकता है. यानी इसका फायदा केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी स्वदेशी नेविगेशन तकनीक का उपयोग बढ़ सकता है.
NVS-02 की तकनीकी गड़बड़ी के बाद इस मिशन पर नजर
NVS-03 की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पहले जनवरी 2025 में लॉन्च किया गया NVS-02 अपनी निर्धारित परिचालन कक्षा तक नहीं पहुंच सका था.
GSLV-F15 ने NVS-02 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित तो कर दिया था, लेकिन सैटेलाइट के एक पायरो वाल्व के इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन में समस्या आ गई. इसके कारण लिक्विड अपोजी मोटर तक जरूरी ऑक्सीडाइजर नहीं पहुंच पाया और उसकी कक्षा बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी.
NVS-03 में ऐसी समस्या दोबारा नहीं आए, इसके लिए इसरो ने जरूरी सुधार किए हैं. हालांकि, फिलहाल नया सैटेलाइट भी GTO में स्थापित हुआ है. इसे निर्धारित जियोसिंक्रोनस परिचालन कक्षा में पहुंचाने के लिए ऑर्बिट रेजिंग की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. इसके बाद ही यह नियमित नेविगेशन सेवाएं देने की स्थिति में आएगा.
NavIC की दूसरी पीढ़ी को आगे मजबूत करने के लिए NVS-04 और NVS-05 सैटेलाइट भी लॉन्च किए जाने हैं.
पीएम मोदी ने ISRO को दी बधाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NVS-03 के सफल प्रक्षेपण पर ISRO के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूत करेगा. इससे महत्वपूर्ण तकनीकों में देश की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और लोगों को बेहतर नेविगेशन सेवाओं का लाभ मिलेगा.
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