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रेल ट्रैक ठीक करने में अब न लगेगी बड़ी टीम, न घटेगी ट्रेनों की रफ्तार; आसनसोल मंडल का नया प्रयोग

Asansol Hydraulic Sleeper Spacer : पूर्व रेलवे के आसनसोल मंडल में रेल ट्रैक के कंक्रीट स्लीपरों को सही स्थिति में लाने के लिए नई हाइड्रोलिक तकनीक अपनाई गई है. इससे स्लीपर समायोजन के काम में कर्मचारियों की संख्या 18-20 से घटकर 6-8 रह जाएगी और ट्रेनों की गति कम किए बिना मरम्मत करना संभव होगा. जामताड़ा में सफल परीक्षण के बाद यह तकनीक ट्रैक रखरखाव के काम को तेज और श्रम-कुशल बनाने में मदद करेगी.

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Asansol Hydraulic Sleeper Spacer : पूर्व रेलवे के आसनसोल मंडल में रेल ट्रैक के कंक्रीट स्लीपरों को सही स्थिति में लाने के लिए नई हाइड्रोलिक तकनीक अपनाई गई है. इससे स्लीपर समायोजन के काम में कर्मचारियों की संख्या 18-20 से घटकर 6-8 रह जाएगी और ट्रेनों की गति कम किए बिना मरम्मत करना संभव होगा. जामताड़ा में सफल परीक्षण के बाद यह तकनीक ट्रैक रखरखाव के काम को तेज और श्रम-कुशल बनाने में मदद करेगी.

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Asansol : रेल ट्रैक के भारी कंक्रीट स्लीपरों को सही स्थिति में लाने के लिए पूर्व रेलवे के आसनसोल मंडल ने नई हाइड्रोलिक तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया है. इस तकनीक की खासियत यह है कि ट्रैक पर मरम्मत का काम करने के दौरान ट्रेनों की गति कम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. साथ ही, पहले जहां स्लीपरों को समायोजित करने के लिए 18 से 20 कर्मचारियों की जरूरत होती थी, वहीं अब यह काम 6 से 8 कर्मचारियों की मदद से किया जा सकेगा. इससे समय और शारीरिक श्रम दोनों की बचत होगी.

15 टन की क्षमता से स्लीपरों को मिलेगा सटीक संरेखण

पूर्व रेलवे की महाप्रबंधक गीतिका पाण्डेय के समग्र मार्गदर्शन और आसनसोल मंडल के मंडल रेल प्रबंधक संग्रह मौर्य के प्रत्यक्ष नेतृत्व में एसएसई/पी.वे./विद्यासागर रेलवे स्टेशन पर इस रिमोट-नियंत्रित हाइड्रोलिक उपकरण का उपयोग शुरू किया गया है. इसकी मदद से भारी कंक्रीट स्लीपरों को सही स्थिति में खिसकाकर रेल ट्रैक का संरेखण दुरुस्त किया जा सकता है.

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इस उपकरण की पुशिंग क्षमता 15 टन है, जबकि इसके पुराने मॉडल की क्षमता 10 टन थी. यह एक बार में स्लीपर को 125 मिलीमीटर तक खिसका सकता है. ट्रैक के दोनों ओर एक साथ उपकरण का इस्तेमाल करने से स्लीपरों को सटीक स्थिति में लाने में मदद मिलती है.

दो कर्मचारी भी उठा सकते हैं उपकरण

हाइड्रोलिक स्पेसर के पूरे सेट में दो हाइड्रोलिक स्पेसर, हैंड पंप, स्टॉपर और छोटे पैकिंग पीस शामिल हैं. उपकरण का वजन लगभग 25 किलोग्राम है, जिसे दो कर्मचारी आसानी से उठाकर कार्यस्थल पर लगा सकते हैं. कर्मचारी ट्रैक के किनारे सुरक्षित स्थान पर खड़े होकर 1.5 मीटर लंबी होज पाइप के माध्यम से इसे संचालित कर सकते हैं.

उपकरण की तकनीकी विशेषताओं में 240 मिलीमीटर की बंद अवस्था में लंबाई, 120 मिलीमीटर की हाइड्रोलिक लिफ्ट और 450 मिलीमीटर लंबा ऑपरेटिंग हैंडल शामिल हैं. इसमें A68 ग्रेड हाइड्रोलिक ऑयल का उपयोग किया जाता है.

जामताड़ा में पॉइंट संख्या 52B पर हुआ परीक्षण

जामताड़ा में पॉइंट संख्या 52B पर इस उपकरण का सफल फील्ड परीक्षण किया गया. प्रक्रिया के तहत सबसे पहले क्रोबार की सहायता से स्लीपर के आसपास की पत्थर की गिट्टी ढीली की जाती है. गिट्टी को पूरी तरह हटाने की जरूरत नहीं पड़ती. इसके बाद ट्रैक के दोनों ओर हाइड्रोलिक उपकरण लगाकर पंप चलाया जाता है और स्लीपर को सही स्थिति में लाया जाता है.

समायोजन पूरा होने के बाद ट्रैक पर ट्रेनों का परिचालन सामान्य गति से जारी रखा जा सकता है. इस प्रक्रिया से ट्रैक की मरम्मत के दौरान ट्रेनों की गति घटाकर 30 किलोमीटर प्रति घंटा करने की पारंपरिक आवश्यकता से बचा जा सकता है.

ट्रैक दुरुस्त करने में लगेगा कम समय

नई तकनीक से कर्मचारियों की संख्या घटने के साथ काम पूरा करने में लगने वाला समय भी कम हुआ है. सामान्य ट्रैक पर एक स्लीपर को समायोजित करने में अब 6 से 8 मिनट लगते हैं, जबकि पुराने तरीके से इसमें 10 से 15 मिनट लगते थे. इसी तरह, टर्नआउट ट्रैक पर काम पूरा करने में अब 12 से 15 मिनट लगते हैं. पहले इस काम में 20 से 25 मिनट या उससे अधिक समय लगता था.

पारंपरिक पद्धति में कर्मचारियों को हाथ से पूरी गिट्टी हटानी पड़ती थी. इससे ट्रैक की नींव प्रभावित होने की आशंका रहती थी और सुरक्षा के मद्देनजर ट्रेनों की गति कम करनी पड़ती थी. हाइड्रोलिक स्पेसर से गिट्टी को पूरी तरह हटाए बिना स्लीपर का समायोजन किया जा सकता है.

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रेल कर्मचारियों और यात्रियों दोनों को होगा लाभ

पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझि ने कहा कि आसनसोल मंडल में हाइड्रोलिक स्लीपर स्पेसर की शुरुआत ट्रैक संबंधी कार्यों को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. उनके अनुसार, ट्रेनों का परिचालन सामान्य गति से जारी रखते हुए कर्मचारियों का काम आसान बनाने वाली यह तकनीक रेल कर्मचारियों और यात्रियों, दोनों के लिए लाभकारी है.

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Soni
सोनी कुमारी
सोनी कुमारी डिजिटल मीडिया क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार हैं और Hellocities24 में ऑथर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार समेत देशभर की ताजा खबरों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करती हैं. पाठकों तक तेज और भरोसेमंद खबरें पहुंचाना प्रमुख उद्देश्य है.
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