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‘मुगल-ए-आजम’ के लिए 75 हजार फीस, एडवांस में लिए सिर्फ ₹1; 75 रुपये से शुरू कर ऐसे बनाई कपूर खानदान की विरासत

Prithviraj Kapoor Birth Anniversary : हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने अभिनय के साथ थिएटर की दुनिया में भी ऐतिहासिक योगदान दिया. उनकी मंडली ने 112 शहरों में 2,662 शो किए और पृथ्वी थिएटर की नींव रखी. उनके प्रयासों से शुरू हुई कपूर परिवार की फिल्मी विरासत आज पांच पीढ़ियों तक पहुंच चुकी है.

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Prithviraj Kapoor Birth Anniversary : हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने अभिनय के साथ थिएटर की दुनिया में भी ऐतिहासिक योगदान दिया. उनकी मंडली ने 112 शहरों में 2,662 शो किए और पृथ्वी थिएटर की नींव रखी. उनके प्रयासों से शुरू हुई कपूर परिवार की फिल्मी विरासत आज पांच पीढ़ियों तक पहुंच चुकी है.

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Prithviraj Kapoor Birth Anniversary Special: फिल्मों में स्टारडम, थिएटर के लिए 2662 शो और कपूर परिवार की पांच पीढ़ियों की विरासत छोड़ गए पृथ्वीराज कपूर

किसी अभिनेता की पहचान उसकी फिल्मों और किरदारों से बनती है, लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनका योगदान पर्दे से कहीं आगे तक जाता है. पृथ्वीराज कपूर ऐसी ही शख्सियत थे. हिंदी सिनेमा में उन्होंने अपनी अदाकारी से अलग मुकाम बनाया, थिएटर को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण साल समर्पित किए और एक ऐसे फिल्मी परिवार की नींव रखी, जिसकी पांच पीढ़ियां आज भी मनोरंजन की दुनिया में सक्रिय पहचान रखती हैं.

उनकी जिंदगी में शोहरत के साथ ऐसे किस्से भी जुड़े हैं, जो उनके व्यक्तित्व को समझने का मौका देते हैं. ‘मुगल-ए-आजम’ में अकबर की भूमिका के लिए 75 हजार रुपये फीस तय होने के बावजूद एडवांस के खाली चेक पर सिर्फ 1 रुपया लिखना हो या अपनी थिएटर मंडली के साथ हजारों किलोमीटर का सफर करना, पृथ्वीराज कपूर ने अपने काम को हमेशा प्राथमिकता दी. 3 नवंबर 1906 को जन्मे इस कलाकार का सफर एक ऐसे नौजवान से शुरू हुआ था, जिसने वकालत का रास्ता छोड़कर अभिनय की अनिश्चित दुनिया को चुना.

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एक अभिनेता के लिए पैसे से ज्यादा अहम था उसका काम

पृथ्वीराज कपूर के जीवन का एक चर्चित प्रसंग फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़ा है. साल 1960 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने मुगल बादशाह अकबर की भूमिका निभाई थी. निर्देशक के. आसिफ इस किरदार के लिए पृथ्वीराज कपूर को ही लेना चाहते थे. बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने अभिनेता को एक खाली चेक दिया और कहा कि अपनी फीस की रकम खुद भर दें.

'मुगल-ए-आजम' के लिए 75 हजार फीस, एडवांस में लिए सिर्फ ₹1; 75 रुपये से शुरू कर ऐसे बनाई कपूर खानदान की विरासत Prithviraj Kapoor Birth Anniversary Special 2
Prithviraj Kapoor Birth Anniversary Special

पृथ्वीराज ने पहले इस तरह फीस तय करने से इनकार किया. बातचीत के दौरान के. आसिफ ने उनसे पूछा कि राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ में काम करने के लिए उन्हें कितने रुपये मिले थे. पृथ्वीराज ने बताया कि उन्हें 50 हजार रुपये मिले थे. इसके बाद निर्देशक ने उन्हें 75 हजार रुपये देने की पेशकश की.

फिल्म की फीस 75 हजार रुपये तय होने के बाद जब एडवांस देने की बारी आई, तो के. आसिफ ने फिर खाली चेक उनके सामने रख दिया. पृथ्वीराज ने उस पर सिर्फ 1 रुपया लिखा. यह रकम उनकी पूरी फिल्म की फीस नहीं थी, बल्कि एडवांस के रूप में लिखी गई थी. पूरी फीस 75 हजार रुपये ही तय हुई थी.

यह प्रसंग उनके काम के प्रति नजरिये को सामने लाता है. वह ऐसे कलाकार थे जिनके लिए किसी किरदार को निभाने का अवसर और अभिनय की संतुष्टि भी बहुत मायने रखती थी.

112 शहरों तक पहुंचाया रंगमंच, खुद निभाते थे हर शो का मुख्य किरदार

फिल्मों में पहचान मिलने के बाद भी पृथ्वीराज कपूर ने थिएटर से अपना रिश्ता कमजोर नहीं होने दिया. उनकी सोच थी कि नाटक देखने का अवसर केवल महानगरों के दर्शकों को ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में रहने वाले लोगों को भी मिलना चाहिए. इसी विचार ने साल 1944 में ‘पृथ्वी थिएटर्स’ की स्थापना का रूप लिया.

इस थिएटर कंपनी की शुरुआत ‘शकुंतला’ नाटक से हुई. इसके बाद ‘दीवार’, ‘पठान’, ‘गद्दार’, ‘आहुति’, ‘पैसा’ और ‘किसान’ जैसे नाटकों का मंचन किया गया. इन प्रस्तुतियों में आम आदमी की जिंदगी, सामाजिक समस्याओं, देश के बंटवारे और हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे विषयों को जगह मिली.

पृथ्वी थिएटर्स की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मंडली ने 112 शहरों में कुल 2,662 शो किए. इन प्रस्तुतियों को पूरा करने में 5,982 दिन लगे. इस पूरे सफर की खास बात यह थी कि पृथ्वीराज कपूर हर शो में खुद मुख्य भूमिका निभाते थे.

उनका सफर केवल मंच पर अभिनय करने तक सीमित नहीं था. वह अपनी पूरी मंडली के साथ ट्रेन के जनरल डिब्बे में यात्रा करते थे. राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद भी उन्होंने अपनी टीम के साथ इसी तरह सफर करना जारी रखा. उनके लिए थिएटर व्यावसायिक गतिविधि से बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी था.

करीब 16 साल तक चलने वाली पृथ्वी थिएटर्स की यह यात्रा साल 1960 में उनकी खराब सेहत के कारण थम गई. हालांकि, रंगमंच के लिए उन्होंने जो आधार तैयार किया, वह आगे भी कायम रहा.

वकील बनने की तैयारी कर रहे थे, अभिनय ने बदल दी जिंदगी

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को समुंदरी में हुआ था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के फैसलाबाद में है. उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में नौकरी करते थे. परिवार की इच्छा थी कि पृथ्वीराज पढ़ाई पूरी करके वकालत करें और एक स्थिर पेशे में अपना भविष्य बनाएं.

उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज में शिक्षा हासिल की. इसके बाद कानून की पढ़ाई के लिए लाहौर चले गए. लेकिन उनका झुकाव पढ़ाई और वकालत के बजाय अभिनय की तरफ था. बचपन से नाटक देखना और उनमें हिस्सा लेना उन्हें पसंद था. यही रुचि धीरे-धीरे उनके जीवन का लक्ष्य बन गई.

परिवार की असहमति के बावजूद उन्होंने वकालत छोड़ने का फैसला किया. उस समय फिल्मों में करियर बनाने के लिए न तो आज जैसी सुविधाएं थीं और न ही सफलता की कोई निश्चित राह. फिर भी पृथ्वीराज ने मुंबई जाने का जोखिम उठाया.

साल 1928 में जब वह मुंबई पहुंचे, तब उनके पास एक छोटा ट्रंक, हॉकी स्टिक, फेल्ट कैप और केवल 75 रुपये थे. शहर में कोई परिचित नहीं था और रहने तथा रोजगार का स्थायी इंतजाम भी नहीं था. मधु जैन की पुस्तक ‘द कपूर: द फर्स्ट फैमिली ऑफ इंडियन सिनेमा’ के हवाले से रेडिफ की एक रिपोर्ट बताती है कि उनकी एक चाची ने मुंबई आने के लिए आर्थिक सहायता दी थी.

स्टूडियो के गेट से शुरू हुआ सफर, फिर मिला पर्दे पर हीरो बनने का मौका

मुंबई पहुंचने के बाद पृथ्वीराज कपूर ने इंपीरियल फिल्म स्टूडियो का रुख किया. स्टूडियो के प्रवेश द्वार पर तैनात एक पठान गार्ड से उनकी मुलाकात हुई. दोनों के बीच पश्तो में बातचीत हुई और गार्ड ने उन्हें अंदर जाने दिया.

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Prithviraj Kapoor Birth Anniversary Special

फिल्मों में काम पाने के लिए उन्हें शुरुआत में एक्स्ट्रा कलाकारों की कतार में खड़ा होना पड़ा. साल 1929 में मूक फिल्म ‘चैलेंज’ में उन्हें पहली बार एक्स्ट्रा कलाकार के तौर पर काम मिला. उस दौर में पर्दे पर भीड़ का हिस्सा बनकर दिखाई देना ही उनके लिए शुरुआत थी.

उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व पर अभिनेत्री एर्मेलिन की नजर पड़ी. वह अपनी फिल्म ‘सिनेमा गर्ल’ के लिए एक हीरो तलाश रही थीं. पृथ्वीराज का लुक और व्यक्तित्व उन्हें पसंद आया और उन्होंने उन्हें मुख्य भूमिका देने की सिफारिश की. इसके परिणामस्वरूप साल 1930 में रिलीज हुई ‘सिनेमा गर्ल’ में पृथ्वीराज को पहली बार हीरो बनने का अवसर मिला.

इस तरह मुंबई में काम की तलाश से शुरू हुआ उनका सफर मुख्य भूमिकाओं तक पहुंचने लगा. यह बदलाव उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ.

भारी आवाज ने बनाई पहचान, ‘सिकंदर’ ने दिलाई बड़ी कामयाबी

साल 1931 में पृथ्वीराज कपूर भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ में दिखाई दिए. हालांकि, इसमें उनकी भूमिका छोटी थी, लेकिन फिल्मों में संवाद और आवाज के दौर में उनकी भारी आवाज तथा बोलने की शैली ने अलग पहचान बनानी शुरू कर दी.

आगे चलकर वह कोलकाता के न्यू थिएटर्स से जुड़े. वहां उन्होंने ‘राजरानी मीरा’, ‘विद्यापति’ और ‘दुश्मन’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया. साल 1937 में प्रदर्शित ‘विद्यापति’ में उनके काम की खूब सराहना हुई.

उनके करियर को सबसे बड़ी पहचान साल 1941 की फिल्म ‘सिकंदर’ से मिली. इसमें उन्होंने सिकंदर की भूमिका निभाई थी. फिल्म में राजा पोरस का किरदार सोहराब मोदी ने निभाया था. दोनों कलाकारों के बीच के संवाद और दृश्य दर्शकों को काफी पसंद आए. इस फिल्म की सफलता ने पृथ्वीराज कपूर को हिंदी सिनेमा के बड़े सितारों की श्रेणी में पहुंचा दिया.

इसके बाद साल 1960 में ‘मुगल-ए-आजम’ में अकबर के रूप में उनकी अदाकारी ने एक और यादगार छाप छोड़ी. उनकी आवाज, संवाद अदायगी और बादशाह के व्यक्तित्व को पर्दे पर उतारने के अंदाज ने इस किरदार को हिंदी सिनेमा के यादगार किरदारों में शामिल कर दिया.

अपने नाम से आगे बढ़कर परिवार के लिए तैयार की फिल्मी जमीन

पृथ्वीराज कपूर की विरासत का सबसे बड़ा विस्तार उनके परिवार के जरिए दिखाई देता है. उनके बेटे राज कपूर ने अभिनय के साथ निर्देशन और फिल्म निर्माण में भी अपनी अलग पहचान बनाई. उन्होंने आरके फिल्म्स की स्थापना की और ‘आवारा’, ‘श्री 420’ तथा ‘संगम’ जैसी यादगार फिल्मों का निर्माण किया.

दूसरे बेटे शम्मी कपूर ने अपने खास डांस और अभिनय शैली से दर्शकों के बीच लोकप्रियता हासिल की. शशि कपूर ने हिंदी सिनेमा के साथ अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में भी काम किया. इस तरह पृथ्वीराज के बाद उनके बेटों ने भी मनोरंजन जगत में अपनी जगह बनाई.

परिवार की अगली पीढ़ियों में रणधीर कपूर और ऋषि कपूर जैसे कलाकार सामने आए. इसके बाद करिश्मा कपूर, करीना कपूर और रणबीर कपूर ने भी अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनाई. आज राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, ऋषि कपूर, करिश्मा, करीना और रणबीर कपूर जैसे नामों के साथ जिस कपूर परिवार की चर्चा होती है, उसकी शुरुआत पृथ्वीराज कपूर से ही हुई थी.

इस परिवार की पहचान केवल एक ही पीढ़ी तक सीमित नहीं रही. अभिनय, निर्देशन और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अलग-अलग पीढ़ियों ने अपना योगदान दिया और पृथ्वीराज द्वारा तैयार की गई जमीन पर आगे बढ़ीं.

पृथ्वी थिएटर के लिए देखा सपना, निधन के बाद बेटे-बहू ने किया पूरा

पृथ्वीराज कपूर रंगमंच को स्थायी पहचान दिलाना चाहते थे. उनकी इच्छा थी कि कलाकारों के पास अपना ऐसा मंच हो, जहां नियमित रूप से नाटकों का आयोजन किया जा सके. इसी उद्देश्य से उन्होंने साल 1962 में मुंबई के जुहू इलाके में दो प्लॉट लीज पर लिए थे.

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एक प्लॉट पर उन्होंने अपने रहने के लिए कॉटेज बनवाया और दूसरे पर थिएटर तैयार करवाने की योजना को आगे बढ़ाया. लेकिन लगातार बिगड़ती सेहत ने उन्हें इस सपने को पूरा होते देखने का अवसर नहीं दिया.

29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर का निधन हो गया. उनके जाने के बाद बेटे शशि कपूर और बहू जेनिफर केंडल ने इस अधूरे काम को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई. दोनों ने उनकी स्मृति में थिएटर को दोबारा तैयार करवाया. अंततः 5 नवंबर 1978 को मुंबई में पृथ्वी थिएटर का उद्घाटन हुआ.

यह थिएटर आज भी मुंबई के रंगमंच जगत का महत्वपूर्ण केंद्र है. इस तरह जिस स्थायी मंच की कल्पना पृथ्वीराज कपूर ने की थी, वह उनके निधन के बाद उनके परिवार के प्रयासों से साकार हुआ.

पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से मिला सम्मान

फिल्म और रंगमंच के क्षेत्र में पृथ्वीराज कपूर के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली. साल 1969 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. इसके बाद साल 1971 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया.

29 मई 1972 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके काम की पहचान उनके बाद भी बनी रही. एक तरफ ‘सिकंदर’ और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसे किरदार उनकी अभिनय क्षमता की गवाही देते हैं, तो दूसरी तरफ पृथ्वी थिएटर्स के 2,662 शो उनके रंगमंच के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं.

75 रुपये लेकर मुंबई पहुंचे एक नौजवान ने अपने दम पर हिंदी सिनेमा में जगह बनाई. उसने अपने लिए शोहरत हासिल की, थिएटर को देशभर में पहुंचाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा पारिवारिक मंच तैयार किया, जिससे कपूर परिवार की पहचान पांच पीढ़ियों तक पहुंची. पृथ्वीराज कपूर की कहानी इसी वजह से केवल एक अभिनेता की कामयाबी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा और रंगमंच में छोड़ी गई एक लंबी विरासत की कहानी है.

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Soni
सोनी कुमारी
सोनी कुमारी डिजिटल मीडिया क्षेत्र में सक्रिय पत्रकार हैं और Hellocities24 में ऑथर के रूप में कार्यरत हैं. बिहार समेत देशभर की ताजा खबरों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करती हैं. पाठकों तक तेज और भरोसेमंद खबरें पहुंचाना प्रमुख उद्देश्य है.
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