Bengal Panchayat Office: किसी को जाति प्रमाणपत्र चाहिए था, किसी को राशन कार्ड का इंतजार था तो किसी को जॉब कार्ड नहीं मिला था. वर्षों से सरकारी दस्तावेजों के लिए चक्कर काट रहे ग्रामीणों को जब पंचायत कार्यालय के एक कमरे में इन दस्तावेजों का ढेर दिखाई दिया, तो वे हैरान रह गए. मामला पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्धमान जिले के कालना-2 ब्लॉक के बोरा धमास गांव का है.
पंचायत कार्यालय में मिले दस्तावेजों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र के अलावा डिजिटल राशन कार्ड, वोटर कार्ड और जॉब कार्ड शामिल हैं. सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से नाराज ग्रामीणों ने जब पंचायत कार्यालय में पहुंचकर जानकारी जुटानी शुरू की, तब यह मामला सामने आया.
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लाभार्थियों की सूची खंगाल रहे थे ग्रामीण, तभी मिली अहम जानकारी
बताया जा रहा है कि कुछ ग्रामीण आवास योजना के लाभार्थियों की सूची को लेकर पंचायत कार्यालय पहुंचे थे. इसी दौरान उनकी नजर एक कमरे में रखे दस्तावेजों पर पड़ी. कमरे में सरकारी कार्ड और प्रमाणपत्र बड़ी संख्या में रखे हुए थे.
दस्तावेज सामने आने के बाद ग्रामीणों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि जिन कागजात के लिए लोग वर्षों से पंचायत और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, वे आखिर यहां किस वजह से पड़े हुए थे.
पुलिस पहुंची तो सील कर दिया गया कमरा
मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस टीम पंचायत कार्यालय पहुंची और संबंधित कमरे की जांच की. इसके बाद कमरे को सील कर दिया गया.
ग्रामीणों ने पंचायत में कथित अनियमितता और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए पूरे मामले की जांच की मांग की है. उनका कहना है कि कई परिवार लंबे समय से सरकारी योजनाओं और सेवाओं का लाभ पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें जरूरी दस्तावेज तक नहीं मिल पाए.
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कुछ ग्रामीणों का दावा है कि वे 15 साल से भी अधिक समय से सरकारी कार्ड और सुविधाओं के इंतजार में हैं. ऐसे में बरामद दस्तावेजों में उनके कागजात होने की आशंका से उनकी चिंता और बढ़ गई है.
पंचायत प्रधान बोलीं- गलतियां और डुप्लीकेट कार्ड बने वजह
विवाद बढ़ने के बाद पंचायत प्रधान मुनमुन बाग ने अपनी सफाई दी. उन्होंने कहा कि बरामद किए गए कई दस्तावेजों में नाम और अन्य विवरणों की वर्तनी गलत थी. कुछ कार्ड डुप्लीकेट भी थे. इसी वजह से उन्हें संबंधित लोगों को नहीं दिया गया.
हालांकि, ग्रामीण इस जवाब से संतुष्ट नहीं हैं. उनका कहना है कि अगर दस्तावेजों में गलती थी तो उन्हें सुधार के लिए भेजा जाना चाहिए था, न कि लंबे समय तक पंचायत कार्यालय के एक कमरे में रख दिया जाना चाहिए था.
प्रधान का दावा- ‘मैं सिर्फ नाम की प्रधान, फैसले दूसरे लेते हैं’
मामले में पंचायत प्रधान के बयान ने विवाद को और गहरा कर दिया है. मुनमुन बाग ने दावा किया कि प्रधान होने के बावजूद पंचायत के सभी फैसले उनके हाथ में नहीं हैं. उन्होंने खुद को साधारण गृहिणी बताते हुए कहा कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें प्रधान बनाया गया, लेकिन सरकारी कामकाज की उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं है.
प्रधान ने आरोप लगाया कि कालना-2 ब्लॉक तृणमूल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रणब रॉय के निर्देश पर पंचायत के अधिकांश काम किए जाते हैं. उनका कहना है कि नेताओं के आदेश के अनुसार ही कई फैसले लिए जाते हैं.
अब पुलिस की जांच के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि पंचायत कार्यालय में इतने महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज आखिर किसकी जिम्मेदारी में रखे गए थे और वर्षों से लंबित दस्तावेज लाभार्थियों तक क्यों नहीं पहुंच सके.
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