Jharkhand High Court: रिम्स से जुड़े जमीन और कथित भ्रष्टाचार मामले में झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार की सुनवाई ने जांच एजेंसी के सामने कई सवाल खड़े कर दिए. अदालत ने गिरफ्तार डेवलपर शुभम साबू को जमानत तो दे दी, लेकिन सुनवाई के दौरान ACB की कार्रवाई के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने पूछा कि जब मामले को करीब आठ महीने हो चुके हैं, तो कथित भूमिका वाले सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई.
निजी आरोपियों पर कार्रवाई, सरकारी अफसरों पर क्यों नहीं?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर सवाल उठाया कि मामले में निजी लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन कथित तौर पर सरकारी जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों के खिलाफ समान कार्रवाई नहीं हुई.
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अदालत ने यह भी पूछा कि जिन सरकारी अधिकारियों की भूमिका मामले में सामने आने की बात कही जा रही है, वे अभी भी सेवा में क्यों बने हुए हैं. कोर्ट की इस टिप्पणी से जांच में सरकारी पक्ष की भूमिका को लेकर सवाल और गहरा गया.
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आठ महीने की जांच के बाद भी गिरफ्तारी नहीं
अदालत ने ACB की जांच की अवधि को भी ध्यान में रखा. कोर्ट के मुताबिक, मामले को करीब आठ महीने गुजर चुके हैं. इसके बावजूद किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि यदि जांच में सरकारी अधिकारियों की भूमिका सामने आती है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई में हो रही देरी का कारण स्पष्ट होना चाहिए.
शुभम साबू की जमानत का आधार बना सरकारी रिकॉर्ड
शुभम साबू की ओर से जमानत के लिए पेश अधिवक्ता ने जमीन से जुड़े दस्तावेजों को आधार बनाया. बचाव पक्ष ने कहा कि संबंधित जमीन को लेकर रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर डेवलपमेंट एग्रीमेंट किया गया था.
अधिवक्ता के अनुसार, सेल डीड पर सरकारी प्रमाणीकरण मौजूद था. दस्तावेज में संबंधित जमीन को न तो अधिग्रहित भूमि बताया गया था और न ही वन भूमि की श्रेणी में रखा गया था.
इसके अलावा संबंधित प्लॉट के लिए 30 साल का नॉन-एनकम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (NEC) भी लिया गया था.
डेवलपर का सवाल- सरकारी दस्तावेज पर भरोसा करना अपराध कैसे?
बचाव पक्ष ने अदालत के सामने अपना मुख्य तर्क यही रखा कि डेवलपर ने अपनी ओर से कोई छिपी हुई जानकारी या निजी दस्तावेज के आधार पर जमीन का सौदा नहीं किया था. उसने उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर ही आगे की प्रक्रिया अपनाई.
अधिवक्ता ने कहा कि यदि बाद में सरकारी रिकॉर्ड गलत या उसमें अनियमितता पाई जाती है, तो उन अधिकारियों की भूमिका भी जांची जानी चाहिए जिन्होंने संबंधित दस्तावेज तैयार किए, प्रमाणित किए या जारी किए.
यानी बचाव पक्ष का तर्क था कि सरकारी रिकॉर्ड पर भरोसा करने वाले निजी व्यक्ति को अकेले जिम्मेदार ठहराने के बजाय उस रिकॉर्ड को तैयार करने वाले तंत्र की भूमिका भी जांची जानी चाहिए.
जांच के दायरे पर कोर्ट की नजर
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों से साफ हुआ कि जांच के दायरे को लेकर कोर्ट की नजर अब सरकारी अधिकारियों की भूमिका पर भी है. कोर्ट ने जानना चाहा कि अगर सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका जांच में सामने आ रही है, तो अब तक उनके खिलाफ गिरफ्तारी या दूसरी कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हुई.
हालांकि, शुभम साबू की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि उनकी गिरफ्तारी उन अधिकारियों को बचाने के लिए की गई, जिनकी भूमिका की पर्याप्त जांच नहीं हुई. यह बचाव पक्ष का आरोप है और इस पर अदालत ने कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं दिया है.
जमानत के बाद सबसे बड़ा सवाल ACB की अगली कार्रवाई पर
शुभम साबू को जमानत मिलने के बाद अब इस मामले में ACB की आगे की जांच पर नजर रहेगी. हाईकोर्ट के सवालों ने जांच एजेंसी के सामने यह चुनौती रख दी है कि कथित भ्रष्टाचार में अगर सरकारी अधिकारियों की भूमिका है, तो उसकी निष्पक्ष जांच किस तरह आगे बढ़ाई जाती है.
रिम्स जैसी महत्वपूर्ण सरकारी स्वास्थ्य संस्था से जुड़े इस मामले में अब सिर्फ जमानत का घटनाक्रम महत्वपूर्ण नहीं है. असली नजर इस बात पर रहेगी कि ACB सरकारी अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच करती है या नहीं और जिम्मेदारी तय करने की दिशा में आगे क्या कदम उठाती है.
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